आजमगढ़। दीपावली दीपों का पर्व कहा जाता है। लेकिन समय के साथ इसमें भी बदलाव आया और इसकी जगह विद्युत झालरों ने ले ली। क्योंकि इससे घर की सजावट दीपों से सस्ती पड़ने लगी। लोगों के रुझान को देखते हुए दुकानदारों ने भी चाइनीज झालरों को लाकर खूब बिक्री की। लेकिन जब चाइनीज सामानों का विरोध शुरू हो गया तो दुकानदारों ने भी इससे तौबा कर ली। जिसका परिणाम है कि इस बार दुकानदारों ने इंडियन झालरों की बिक्री की। हालांकि देशी झालर चाइनीज झालर से थोड़ी महंगी जरूर थी लेकिन इसकी परवाह किए बगैर जमकर खरीदारी की और घरों को सजाया। दीपावली पर दीपों का प्रचलन कम होने का परिणाम है कि दीपावली के बाद भी प्रकाश देखकर लाइटों के पास आने वाले कीड़ों प्रकोप दिसंबर तक देखने को मिल रहा है। नहीं तो पहले यह कीड़े दीपावली के कुछ दिन बार स्वत: ही समाप्त हो जाते थे। क्योंकि बहुत से कीड़े दीप की लौ से जलकर मर जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं होने से इनका प्रकोप काफी दिनों तक देखने को मिलता है। दीपावली पर झालरों का प्रकोप बढ़ने से कुम्हारों के कारोबार पर भी इसका असर पड़ा है। पहले जहां लोग कुम्हारों को खोजकर उनसे दीए की खरीदारी करते थे। आज लोग झालरों से काम चला लेते हैं। जिसका नुकसान कुम्हारों का उठाना पड़ता है। वैसे इस बार कुम्हार के कारोबार में कुछ इजाफा देखने को मिला है। हरिश्चंद्र प्रजापति ने बताया कि इस बार दीयों का बाजार पिछले कई वर्षों की तुलना में अच्छा है। आगे इसके और बढ़ने के आसार हैं।