मेजवां। समय के साथ राजनीति और चुनाव प्रचार के तरीकों में भी काफी बदलाव आया है। पहले प्रत्याशी बैलगाड़ी और साइकिल से प्रचार करते थे आज लग्जरी गाड़ियां प्रत्याशियों का स्टेटस सिंबल बन गई है। यह बातें कहना है कई चुनावों देख चुके लोगों का। फूलपुर कस्बा निवासी राजधारी प्रसाद का कहना है कि शुरुआती दौर के चुनाव में जिस तरह का जोश और उत्साह देखने को मिलता था। अब वह खत्म हो गया है। अब नेताओं के साथ मतदाताओं में लालच की भावना बन गई है। जब से दागी उम्मीदवार सत्ता के गलियारे में पहुचने लगे हैं तब से राजनीति में और भी अधिक गिरावट आ गई है। डा. कनीज फातमा ने कहा कि सत्तर से अस्सी के दशक के दौरान चुनाव में कविता और शेरो शायरी से भी प्रचार किया जाता रहा। जबकि इसी दौर में छल और कपट ने भी राजनीत में अपनी जगह बनाना शुरू कर दी है। जो बढ़ती ही जा रही है। चुनाव आयोग लाख कोशिशें कर रहा है। लेकिन चुनाव दूषित ही होता जा रहा है। योगेश उपाध्याय ने कहा कि पहले के नेता काफी सादगी से रहते थे और वे विनम्रता के साथ लोगों से पेश आते थे। जब नेता गांव पहुंचता था तो उनके साथ गांव वाले एकजुट होकर चल पड़ते थे। वाहन से न जाकर वे पैदल चलना मुफीद समझते थे। उम्मीदवारों का स्वागत भी आम जनता उत्साह पूर्वक करती थी। लेकिन आज लग्जरी वाहन और सुरक्षाकर्मियों के कारण कोई भी इन तक नहीं पहुंच पाता है। रामाशीष बरनवाल ने आजादी के बाद हुए चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा की कमी के चलते पहले किसी भी मतदाता के मन में जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद जैसे विचार नहीं थे। उस समय सभी दलों के कार्यकर्ता और नेता पैदल या तो इक्का, रिक्शा से चलकर गुड़, लाई, चना कहकर लोहे से बना भोपू से प्रचार करने में व्यस्त रहते थे। आज के दौर में चमचमाती गाड़ियों के काफिले के साथ धन की ताकत पर प्रचार हो रहा है।