सगड़ी। कहते हैं कि होली का सम्मत जलते ही बहुत से दुखों का अंत हो जाता है। लेकिन होली के सम्मत में बनी लिट्टी खाने से मिर्गी और फरका जैसी बीमारी ठीक होती है, ऐसा पहली बार देखने को मिला है। जब होली के दिन लोग अपने गांव में रखे सम्मत को जलाते हैं तब सगड़ी तहसील क्षेत्र के तुरकौली गांव में मिर्गी और फरका रोग से पीड़ित लोगों का जमावड़ा होता है। तुरकौली गांव निवासी रामपलट चौहान और पतिराज चौहान पुत्रगण स्व. मेड़ही चौहान होलिका दहन की रात्रि मिर्गी व फरका के इलाज के लिए मरीजों को लिट्टी खिलाते हैं। लोगों का मानना है कि तीन से पांच वर्ष तक लगातार लिट्टी खाने से यह रोग जड़ से समाप्त हो जाता है। होलिका दहन के दिन दोपहर से ही गांव में लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। लिट्टी खाने के लिए बिहार, मध्यप्रदेश के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से लोग यहां पहुंचते हैं। लोगों का कहना है कि सैकड़ों वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। पहले रामपलट चौहान व पतिराज चौहान के पिता मेड़ही चौहान लिट्टी के तौर पर दवा खिलाते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र रामपलट और पतिराज लोगों को दवा खिलाते हैं। होलिका दहन के बाद जब लोग अपने घरों को चले जाते हैं और होलिका दहन का स्थान सूना हो जाता है। तब ये लोग वहां पर सम्मत की आग में लिट्टी बनाते हैं। लिट्टी बनाते समय उस स्थान पर वहां कोई नहीं रहता है। लिट्टी बनाने के बाद वह लोग पूरे गांव में घूम-घूमकर लिट्टी के छोटे-छोटे टुकड़े कर लोगों में बांटते हैं। गीता, प्रकाश, मुनियां, दीपक, दुलारी आदि का कहना है कि पूर्व वर्ष से वह लोग दवा खाने आ रहे हैं और उन्हें लिट्टी खाने से बहुत फायदा हुआ है। मान्यता है कि दवा खाने के बाद मरीज को गांव का सीवान छोड़ देना होता है।