आजमगढ़। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज और जिला प्रशासन के तत्वाधान में सूत्रधार संस्थान के सहयोग और ममता पंडित के संयोजन में आयोजित चतुरंग नाट्य उत्सव के आखरी दिन सूत्रधार संस्थान द्वारा बूढ़ी काकी का मंचन किया गया। इस नाटक के जरिए कलाकारों ने एक विधवा जो दूसरे के ऊपर निर्भर है उसके दर्द को बखूबी उकेरा। चतुरंग नाट्यउत्सव की आखिरी संध्या का शुभारंभ डीआईजी मनोज तिवारी और एसपी त्रिवेणी सिंह, एसडीएम सदर अरुण सिंह, भाजपा नेता अखिलेश मिश्रा गुड्डू और संगीता तिवारी ने संयुक्त रूप से किया। नाटक में बूढ़ी काकी जिनके पति और बच्चों का देहांत कालांतर में ही हो चुका है। अब वो अपने भतीजे बुधिनाथ के आश्रय पर रहती है। बुधिनाथ की पत्नी रुपा काकी को खाने को नहीं देती है। घर में कोई उनकी खोजखबर नहीं लेता है। सिवाय लाडली के जो रूपा और बुधिनाथ की बेटी है। बुधिनाथ के बेटे का तिलक घर में पड़ता है। बहुत बड़ा उत्सव होता है। गांव भर के लोग खाते हैं पर उस दिन भी काकी को कोई भोजन नहीं देता। काकी कलपती रहती है। लाडली आधी रात को उनके लिए चोरी से कुछ खाने को ले जाती है पर काकी की भूख शांत नही होती। काकी लाडली के साथ बाहर पड़े जूठे पत्तलों के पास जाती है और जूठन चुन चुन कर खाती है। तभी रूपा वहां आकर उस दृश्य को देखती है उसे बहुत ही ग्लानि होती है। वो काकी से माफी मांगती है और उन्हें खाने को देती है। इस प्रकार नाटक का सुखद अंत होता है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त नाट्य निर्देशक अभिषेक पंडित के सधे निर्देशन और समकालीन नवीन प्रयोग से यह नाटक आज के परिवेश से बहुत ही सलीके से जुड़ता है। प्रेमचंद की कहानी में मोबाईल फोन का प्रयोग बहुत ही चालाकी से किया गया। लोक और मॉर्डन दोनों शैलियों का फ्यूजन निर्देशकीय कल्पना का परिणाम रहा। जो मूल कथ्य को और भी रोचक तरीके से प्रस्तुत करने में सफल हुआ। नाटक में डा. अलका सिंह, अंगद कश्यप, रितेश रंजन, संदीप गौड़, शुभम बरनवाल मुख्य अभिनेता रहे। संगीत परिकल्पना शशिकांत कुमार ने किया।मुख्य गायक की जिम्मेदारी अभिषेक पंडित ने स्वयं निभाई। इस मौके पर युवा भाजपा नेता कमलेंद्र मिश्र, गांधीगिरी टीम के विवेक पांडेय, गोविंद दुबे, सूरज यादव, हरिओम यादव, सुनील दत्त विश्वकर्मा, गुड्डू विश्वकर्मा, शिखा मौर्य, हेमंत श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे।