विशेषज्ञों के माध्यम से रडार सर्वे कराया गया
इस सवाल के जवाब के लिए जमीन के नीचे वैज्ञानिक जांच कराने का प्रयास किया गया। दिल्ली आईआईटी और रूड़की आईआईटी से संपर्क किया गया, लेकिन दोनों संस्थानों ने असमर्थता जताई। इसके बाद ‘तोजो विकास इंटरनेशनल’ नाम की संस्था के विशेषज्ञों के माध्यम से रडार सर्वे कराया गया।
पत्र के मुताबिक, वर्ष 2003 में कनाडा के विशेषज्ञों ने रडार तरंगों के माध्यम से जमीन की सतह के नीचे करीब 16.5 फीट तक 50 से अधिक स्थानों की तस्वीरें लीं। इन तस्वीरों के आधार पर तैयार रिपोर्ट में जमीन के नीचे किसी भवन की मौजूदगी का उल्लेख किया गया था। इसके बाद रडार रिपोर्ट की सत्यता और उसमें सामने आए तथ्यों की जांच के लिए एएसआई को संबंधित स्थानों पर उत्खनन करने का आदेश दिए जाने का पत्र में उल्लेख है।
उत्खनन में शामिल थे 40 प्रतिशत मुस्लिम समाज के मजदूर
चंपत राय के लिखे पत्र के अनुसार मजदूरों में 40 प्रतिशत मुस्लिम समाज से रखने, उत्खनन की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने तथा सभी पक्षकारों, उनके अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों को मौके पर मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी। यह उत्खनन करीब छह महीने चला। एएसआई की रिपोर्ट दो हिस्सों में थी। एक हिस्से में तस्वीरें थीं, जबकि दूसरे में मानचित्र और लिखित विवरण शामिल था।
2010 के फैसले का भी जिक्र
रिपोर्ट के सारांश का हवाला देते हुए लिखा है कि यहां एक उत्तर भारतीय शैली का मंदिर था। पत्र में बाताया गया है कि प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास से संबंधित पुस्तकों, राजस्व अभिलेखों, रडार फोटोग्राफी रिपोर्ट, उत्खनन रिपोर्ट और गवाहों के बयानों को आधार बनाकर 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीनों न्यायाधीशों ने अलग-अलग निर्णय सुनाए।