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यूपी: चढ़ावा चोरी के गवाह चंपत राय की पुस्तक 'श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास जस का तस' देशभर में बनी चर्चा

Fri, 25 Sep 2026 07:44 PM IST
Akash Dwivedi अमर उजाला, अयोध्या

सार

राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी प्रकरण में गवाह के रूप में नाम आने के बाद चंपत राय की पुस्तक चर्चा में है। ‘श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास जस का तस’ में मंदिर आंदोलन से निर्माण तक की यात्रा का उल्लेख है। पुस्तक 112 बिंदुओं में घटनाओं और प्रमुख प्रसंगों को समेटती है।
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चंतप राय की पुस्तक चर्चा में। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राम मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूर्व महासचिव चंपत राय का नाम आरोपियों की सूची में नहीं बल्कि गवाहों में आने के बाद अब उनकी प्रकाशित पुस्तक ‘श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास जस का तस’ भी चर्चा में है। मंदिर आंदोलन से लेकर राम मंदिर निर्माण तक की यात्रा को समेटे इस 40 पेज की पुस्तक की प्रतियां डाक के माध्यम से देशभर में भेजी जा रही हैं। अयोध्या के संतों और प्रमुख लोगों को भी पुस्तक भेंट की जा रही है।

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चंपत राय लंबे समय तक श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव रहे और राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका में रहे। ऐसे समय में जब मंदिर के चढ़ावे की रकम में चोरी का मामला जांच से निकलकर अदालत की कार्यवाही में पहुंच चुका है, उनकी पुस्तक का सामने आना इसे लेकर अलग तरह की चर्चा का कारण बना है। 

इस पुस्तक में राम मंदिर आंदोलन के 500 साल के इतिहास को चंपत राय ने समाहित किया गया है। संघर्ष दिखाने की कोशिश की है, साथ ही मंदिर निर्माण की विशेषता को भी बताया है।पुस्तक का मूल विषय मंदिर आंदोलन और निर्माण यात्रा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसे पढ़ने और देखने का संदर्भ पहले से अलग हो गया है।

 

 

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112 बिंदुओं में आंदोलन से निर्माण तक का सफर

40 पेज की इस पुस्तक में 112 बिंदुओं में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौर से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद मंदिर निर्माण तक की घटनाओं का उल्लेख किया गया है। पुस्तक में मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न प्रसंगों, निर्णयों और इसमें जुड़े लोगों की भूमिका का भी जिक्र है। 

यही वजह है कि राम मंदिर आंदोलन और निर्माण की अंदरूनी यात्रा को जानने के लिहाज से पुस्तक को महत्वपूर्ण दस्तावेज के तौर पर देखा जा रहा है। पुस्तक की प्रतियां डाक के जरिये देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजी जा रही हैं। अयोध्या में भी संत-महंतों और आंदोलन से जुड़े लोगों तक इसे पहुंचाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि कई लोगों को पुस्तक व्यक्तिगत रूप से भी भेंट की गई है।
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