प्रसिद्ध शायर Bashir Badr के निधन से अयोध्या के साहित्य जगत में शोक है। साहित्यकारों ने उन्हें शायरी की दुनिया का बेजोड़ नाम बताया। वर्ष 2005 में वह आखिरी बार फैजाबाद के मुशायरे में शामिल हुए थे। स्थानीय साहित्यकारों ने उनके साथ बिताए पलों और उनकी यादगार शायरी को याद किया।
शायर डॉ बशीर बद्र के निधन की खबर से अयोध्या के साहित्य जगत में भी गम का माहौल है। यहां के साहित्यकारों का मानना है कि शायरी जगत में उन सा कोई नहीं था। डॉ उर्फी बताते हैं कि जब 1971 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मेडिकल में दाखिला हुआ तभी से उनका संपर्क था। वह पान वाली कोठी के एक कमरे में रहते थे। अक्सर शमशाद मार्केट में अड़ी लगती थी।
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डॉ उर्फी बताते हैं कि बात 2005 की है। फैजाबाद में एक मुशायरा वह करा रहे थे। उसमें उन्होंने बशीर साहब का नाम पोस्टर में डाल दिया था। जब बशीर साहब को कार्यक्रम की जानकारी दी तो उन्होंने मन कर दिया। कई बार आग्रह के बाद भी वह नहीं माने।
डॉ उर्फी के अनुसार फिर उन्होंने बशीर साहब की पत्नी राहत बद्र से संपर्क साधा जो उनकी रिश्तेदार भी हैं। कई बार कहने के बाद वो बोलीं कि कोशिश करती हूं। कुछ दिनों बाद बशीर साहब का फोन आया कि आपने मेरे घर में सेंध लगा दी। राहत ने रिजर्वेशन कराने के बाद मुझे कार्यक्रम की जानकारी दी।
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डॉ उर्फी के अनुसार, 2005 में फैजाबाद का मुशायरा शायद उनका आखिरी मुशायरा था। उन्होंने बताया कि वह सपत्नीक आए और उनके घर पर ठहरे। उन्होंने बताया कि बशीर साहब की बहन सईदा बेगम भी पुरानी सब्जी मंडी में रहती थीं। उनके यहां केवल एक कमरे थे। इस वजह से वे बहन से मिलने जब भी आते थे तो उनके यहां ही रहते थे और कई कई दिन तक रहते थे। उनकी शायरी बेजोड़ थी।