त्रेतायुग का गौरवशाली प्रसंग दोहराने जा रही अयोध्या
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने जन्मभूमि के प्रति प्रभु श्रीराम के अनुराग को शब्द दिए हैं- ''जद्यपि सब बैकुंठ बखाना, वेद पुरान बिदित जग जाना। जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।'' जगद्गुरु रामदिनेशाचार्य कहते हैं कि दीपोत्सव में अयोध्या उसी गौरवशाली प्रसंग को अपनी आंखों के सामने दोहराने जा रही है। रामनगरी की सजावट भी इस उत्सव की कथा कह रही है।
तुलसी उद्यान के पास दीपोत्सव की तैयारियां निहार रहे महंत गिरीश दास कहते हैं, अवध में उत्सव है भारी। चौबीसों घंटे रामधुन और कीर्तन से गूंजती रामनगरी का वातावरण त्रेतायुग को सजीव कर रहा है। महंत विवेक आचारी अयोध्या में सजी होर्डिंग पर अंकित रामचरित मानस की पंक्ति पुनि देख अवधपुरी अति पावनि, त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि... के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हैं। बोले कि दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति देने वाली इस पुण्यभूमि के दर्शन के लिए आज देश-दुनिया से श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। इसी वैश्विक आस्था का प्रतिबिंब दीपोत्सव में भी दिखाई दे रहा है।