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परंपरा : कभी घाट-घाट पर गूंजी रामकथा, फिर 14 साल का वनवास

Tue, 13 Oct 2026 12:03 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
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34- राजेंद्र निवास पर रामलीला का मंचन करते कलाकार-फाइल फोटो
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अयोध्या। रामनगरी की रामलीला परंपरा केवल मंच पर रामकथा के मंचन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी जड़ें यहां की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में भी गहराई तक समाई हैं। इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए स्वर्गद्वार स्थित राजेंद्र निवास की रामलीला ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी अयोध्या की गलियों और घाटों पर रामकथा के प्रसंग साकार हुए तो कभी आर्थिक संकट के चलते आयोजन बंद करना पड़ा। सोमवार से राजेंद्र निवास की रामलीला का मंचन फिर शुरू हो गया है।
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वर्ष 1960 में समिति के गठन के साथ शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है। अयोध्या की प्राचीन रामलीला परंपरा में राजसदन और लक्ष्मण किला की रामलीलाओं का विशेष स्थान रहा है। वर्ष 1958 में इन दोनों रामलीलाओं के बंद होने से स्वर्गद्वार के नवयुवक व्यथित थे। करीब एक से डेढ़ वर्ष तक मंथन के बाद महंत सियावर शरण, श्रीनिवास रंगाचारी, महंत छविराम दास और पंडा शंकर दत्त के नेतृत्व में वर्ष 1960 में अयोध्यास्थ श्रीरामलीला महोत्सव समिति का गठन किया गया।
समिति के अध्यक्ष महंत वैदेही बल्लभ शरण बताते हैं कि रामलीला को नया स्वरूप देने के उद्देश्य से वर्ष 1963 से 1966 के बीच बनारस के रामनगर की रामलीला की तर्ज पर अयोध्या के विभिन्न स्थानों और सरयू के घाटों पर अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया गया। हालांकि, विभिन्न स्थानों पर मंचन कराने में व्यावहारिक कठिनाइयों और व्यवस्थागत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 1967 से रामलीला का आयोजन राजेंद्र निवास तक सीमित कर दिया गया।
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1994 में बंद हुई, 2008 में नए कलेवर में लौटी
आर्थिक संकट और अन्य कारणों के चलते राजेंद्र निवास की रामलीला वर्ष 1994 में बंद हो गई। करीब 14 वर्ष तक आयोजन ठप रहने के बाद वर्ष 2008 में समिति ने इसे नए कलेवर में फिर शुरू किया। वर्तमान में महंत वैदेही बल्लभ शरण की अध्यक्षता में रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। महंत राजीव लोचन शरण और डॉ. प्रभाकर मिश्र भी आयोजन को भव्य बनाने में सहयोग करते हैं।
मुस्लिम समाज की भागीदारी भी रही परंपरा का हिस्सा
राजेंद्र निवास की रामलीला की एक विशेषता इसमें विभिन्न समुदायों की सहभागिता भी रही है। आयोजन के शुरुआती 25-26 वर्षों तक मुस्लिम समाज के लोगों का अच्छा सहयोग मिलता रहा। महमूद चूड़ी वाले ने करीब 12 वर्षों तक रामलीला में सहयोग किया, जबकि उनके बेटे भोला ने भी 14 वर्षों तक अपनी सहभागिता निभाई। विभिन्न समुदायों की यह भागीदारी सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की मिसाल रही।
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