अयोध्या। भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर में मंदिरों के शिखरों पर लहराता ध्वज केवल आस्था का नहीं, बल्कि शक्ति, सत्ता और सांस्कृतिक गौरव का भी सशक्त प्रतीक रहा है। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 250 ईस्वी के आसपास जब भारतीय मंदिर वास्तु का सुदृढ़ विकास प्रारंभ हुआ, तभी से मंदिरों को पहचान देने वाले विशेष निशान सामने आने लगे। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ध्वज है।
राम मंदिर के शिखर पर 25 नवंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ॐ, कोविदार वृक्ष व सूर्य के चिन्ह से सज्जित ध्वज चढ़ाएंगे। मंदिरों पर ध्वज चढ़ाने की परंपरा अत्यंत गौरवशाली है। इतिहासकार डॉ़ प्रज्ञा मिश्रा बताती हैं कि मंदिरों में ध्वज चढ़ाना अब भी उतना ही पवित्र, उतना ही प्रतीकात्मक और उतना ही सांस्कृतिक महत्व रखता है, जितना प्राचीन भारत में था। मंदिर के निर्माण की शुरुआत वैसे तो मौर्य काल में ही हो गई थी, लेकिन गुप्त काल (250-550 ईस्वी) को मंदिर वास्तु का उद्भाव माना जाता है। गुप्त काल को भारतीय संस्कृति का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसी काल में मंदिरों के शिखर पर ध्वज लगाने की परंपरा पूरी तरह स्थापित और प्रतिष्ठित हो गई। स्कंद गुप्त के अभिलेख में इसका वर्णन मिलता है।
डॉ़ प्रज्ञा के अनुसार सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (375-415 ईस्वी) ने कई मंदिरों का निर्माण कराया और ध्वज भी लगवाए थे, जिसमें दिल्ली के मेहरौली में स्थित विष्णु को समर्पित लौह स्तंभ एक प्रमुख उदाहरण है। चंद्रगुप्त द्वितीय विष्णु के भक्त थे और उन्होंने अपने ध्वज पर प्रतीक के रूप में विष्णु के वाहन गरुड़ की आकृति बनवाई थी। दिल्ली में स्थित लौह स्तंभ को भगवान विष्णु के लिए समर्पित एक ध्वज के रूप में स्थापित किया गया था। ध्वज को मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति, सुरक्षा और धार्मिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। दूर-दूर तक नजर आने वाला यह ध्वज संकेत देता था कि यहां देवालय है, जहां धर्म, अनुशासन और लोक कल्याण की शक्ति उपस्थित है।
देव ऊर्जा का केंद्र माना गया है मंदिर का शिखर
जगद्गुरु रामदिनेशाचार्य बताते हैं कि मंदिरों में स्थापित ध्वज की धारा को देव-ऊर्जा का प्रवाह माना जाता है। मंदिर के शिखर को देव-ऊर्जा का केंद्र माना गया है। ध्वज को मंदिर की दिव्य उपस्थिति और संरक्षण का संकेत, ध्वज परिवर्तन को शुभ और ऊर्जा-संवर्धन का रूप माना जाता है। ध्वज को विजय, धर्म की रक्षा और देव शक्ति के अधिष्ठान (रहने का स्थान) का प्रतीक माना जाता है। ध्वज चढ़ने से मंदिर की प्रतिष्ठा पूर्ण मानी जाती है। शिखर पर लहराता ध्वज दर्शाता है कि देवता की शक्ति और आशीर्वाद निरंतर सक्रिय है।
12r- राम मंदिर के शिखर का दृश्य- ट्रस्ट