33- वाल्मीकि रामायण कथा का प्रवचन करते रत्नेश प्रपन्नाचार्य- संवाद
अयोध्या। रामनगरी में नवनिर्मित देवस्थान श्रीरामायण बेला में प्राणप्रतिष्ठा के अवसर पर विभिन्न अनुष्ठानों की धूम है। वाल्मीकि रामायण की कथा में जगद्गुरु रत्नेशप्रपन्नाचार्य जी ने कहा कि राम की मधुर बाललीला केवल भाव-विभोर करने वाली कथा नहीं, बल्कि जीवन के संस्कारों का प्रथम अध्याय है। उसमें सिखाया गया है कि महानता का मूल विनय है, सामर्थ्य का सार संयम है।अयोध्या धाम की पावन भूमि पर जब परम करुणामय भगवान ने मानव रूप धारण किया, तब वह केवल एक जन्म नहीं था वह धर्म, मर्यादा और प्रेम का पुनः अवतरण था। वाल्मीकि रामायण में वर्णित वह दिव्य प्रसंग आज भी हृदय को आलोकित कर देता है। बाल्यकाल में भी राम की सरलता अद्वितीय थी। माता की गोद में किलकते हुए भी उनकी दृष्टि में अद्भुत गंभीरता झलकती थी। भ्राताओं के साथ क्रीड़ा करते समय वे स्नेह और समता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करते, मानो प्रेम स्वयं खेल रहा हो। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में राम की विनयपूर्ण उपस्थिति यह संदेश देती है कि ईश्वर भी जब मानव बनते हैं, तो अनुशासन और ज्ञान के पथ पर चलकर समाज को आदर्श प्रदान करते हैं।