अयोध्या। सत्य, संयम, शुद्धता, तप और त्याग जैसे जीवन मूल्यों को आत्मसात करने के संकल्प के साथ मंगलवार से दिगंबर जैन मंदिर में 11 दिवसीय पर्यूषण पर्व शुरू होगा। जैन धर्म में इसे दशलक्षण पर्व के नाम से भी जाना जाता है। आयोजन में देशभर से हजारों जैन श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
पर्यूषण पर्व जैन दर्शन के उस मूल भाव को सामने रखता है, जिसमें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। 11 दिनों तक चलने वाले आयोजन में क्षमा, मार्दव (मृदुता), आर्जव (सरलता), सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जैसे दशलक्षण धर्म के मूल्यों की साधना की जाएगी। श्रद्धालु इन मूल्यों को केवल पूजा-विधान तक सीमित न रखकर उन्हें अपने आचरण में उतारने का संकल्प लेंगे।
1008 पीठिकाओं पर होगा इंद्रध्वज विधान
पर्व का प्रमुख आकर्षण इंद्रध्वज विधान होगा। इसके लिए मंदिर परिसर में विशाल पंडाल तैयार किया गया है। इसमें 1008 पीठिकाएं स्थापित की गई हैं। विधान के दौरान 1008 दंपति इंद्र-इंद्राणी के स्वरूप में जैन पुराकथाओं में वर्णित अकृत्रिम जिनालयों में विराजमान परम मुक्त जिनों के प्रतीकों का पूजन करेंगे और उन्हें ध्वज अर्पित करेंगे।
इंद्रध्वज विधान के साथ प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम और सत्संग के सत्र भी आयोजित किए जाएंगे। गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता और साध्वी चंदनामती माता प्रवचन के माध्यम से दशलक्षण धर्म की महिमा और इसके मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने के सूत्र बताएंगी।
मोक्ष की प्राप्ति के लिए मूल्यों को आत्मसात करना जरूरी : रवींद्रकीर्ति
दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र सहित अनेक जैन तीर्थों के पीठाधिपति रवींद्रकीर्ति स्वामी ने कहा कि पर्यूषण पर्व को दशलक्षण पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इसका मूल उद्देश्य जैन धर्म के अभीष्ट मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में साधना करना है। यह लक्ष्य धार्मिक मूल्यों को जीवन में शत-प्रतिशत आत्मसात करने के निरंतर प्रयास से ही संभव है। पर्व के 11 दिनों में श्रद्धालुओं की साधना उन्हें इसी आत्मिक और आध्यात्मिक यात्रा की ओर ले जाएगी।