अयोध्या। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर की पूजा-अर्चना और राग-भोग व्यवस्था में व्यापक सुधार की तैयारी शुरू हो गई है। रामानंदीय परंपरा के अनुरूप पूजा-पद्धति के पूर्ण अनुपालन को लेकर संत समाज ने ट्रस्ट के समक्ष कई अहम सुझाव रखे हैं। संतों ने स्पष्ट कहा कि मंदिर की वर्तमान व्यवस्था में रामानंदीय परंपरा के कई मानकों का अपेक्षित रूप से पालन नहीं हो रहा है। इस पर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने आश्वस्त किया कि अगले दो-तीन महीनों में पूजा-व्यवस्था और श्रद्धालुओं से जुड़ी व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण सुधार दिखाई देंगे।
बुधवार को गोविंद देव गिरि ने रामनगरी के प्रमुख संतों के साथ बैठक कर मंदिर संचालन और पूजा-व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की। बैठक में संतों ने कहा कि श्रीरामजन्मभूमि मंदिर रामानंदीय परंपरा का मंदिर है, इसलिए यहां राग-भोग, सेवा, पूजा-पद्धति और धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन उसी परंपरा के स्थापित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। संतों ने यह भी कहा कि पूजा व्यवस्था में समय-समय पर रामनगरी के विद्वान संतों की राय को संस्थागत रूप से शामिल किया जाए।
बैठक में श्रद्धालुओं की सुविधाओं का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। संतों ने कहा कि गर्भगृह में केवल अधिकृत पुजारियों का प्रवेश धार्मिक मर्यादा के अनुरूप है, लेकिन आम श्रद्धालुओं को चरणामृत और प्रसाद जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं सहज रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उनका कहना था कि वर्तमान व्यवस्था में इस दिशा में सुधार की आवश्यकता है। श्रीराम बल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमार दास ने बताया कि बैठक में संतों ने परंपरागत व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट की ओर से इन सुझावों को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया गया है और अगले दो-तीन महीनों में इनके अनुरूप बदलाव किए जाएंगे। साथ ही भविष्य में भी मंदिर की पूजा-व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं से जुड़े विषयों पर संत समाज से नियमित परामर्श लिया जाएगा।
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महंत दिनेंद्र दास भी उठा चुके हैं पूजा व्यवस्था का मुद्दा
- राम मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास भी इससे पहले मंदिर की पूजा व्यवस्था को लेकर सवाल उठा चुके हैं। उनका कहना था कि मंदिर की पूजा व्यवस्था संत समाज के मार्गदर्शन में संचालित होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि निर्मोही अखाड़े ने न्यायालय में केवल पूजा के अधिकार की मांग की थी। उनके अनुसार रामानंदीय परंपरा के अनुरूप धार्मिक विधि-विधानों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए तथा गर्भगृह में प्रवेश पर निर्धारित धार्मिक मर्यादाओं का सख्ती से पालन होना चाहिए।