अयोध्या। इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत खगोलीय संयोग के बीच हो रही है। रविवार को लगने वाले चंद्र ग्रहण के साथ ही पितृ पक्ष का शुभारंभ होगा। वैदिक आचार्योंं का मानना है कि ग्रहण काल और पितृ पक्ष का यह संयोग दुर्लभ है। ऐसी स्थिति में पितरों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व बढ़ जाता है।
पितृ पक्ष जिसे श्राद्ध भी कहा जाता है। पितृ पक्ष का सनातन धर्म में बहुत ही विशेष महत्व होता है। मान्यताओं के अनुसार, इन 15 दिन पितृ अपने परिवार को आशीर्वाद देने का लिए धरती पर आते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण आदि कार्य किए जाते हैं। आचार्य शिवेंद्र त्रिपाठी के अनुसार इस साल भाद्रपद महीने की पूर्णिमा तिथि सात सितंबर को देर रात एक बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन सात सितंबर को ही रात 11 बजकर 38 मिनट पर होगा। पंचांग को देखते हुए पितृ पक्ष की शुरुआत सात सितंबर से ही होगी। इसकी समाप्ति 21 सितंबर को होगी। तृतीया व चतुर्थी का श्राद्ध एक ही दिन 10 सितंबर को होगा।
आचार्य शिवेंद्र बताते हैं कि शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में कोई भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, दुकान का मुहूर्त, नया कारोबार का आरंभ आदि नहीं करना चाहिए। पितृपक्ष में अपशब्दों का प्रयोग करें। किसी के साथ भी छल कपट आदि न करें। पितृ पक्ष में ब्रह्मचर्य का पालन करना बेहद जरूरी है। पितृपक्ष के दौरान शराब, पान, बैंगन, प्याज, मांसाहार, सफेद तिल, लौकी, मूली, लहसुन, बासी भोजन, सरसों का साग, मसूर की दाल, काला नमक, सत्तू आदि का सेवन वर्जित माना जाता है। ऐसा करने से पितर नाराज हो जाते हैं।