सदर बाजार में घर में मोमोज बनाते पूर्व खिलाड़ी धीरेंद्र कुमार चंद।
अयोध्या। देश और प्रदेश का नाम रोशन करने का सपना लेकर वर्षों तक मैदान में पसीना बहाने वाले जिले के कई खिलाड़ी आज रोजगार की तलाश में खेल से दूर हो चुके हैं। राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने और वर्षों तक कठिन मेहनत करने के बावजूद उन्हें न तो स्थायी नौकरी मिली और न ही ऐसा मंच, जहां उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर मिल सके। परिणामस्वरूप कई खिलाड़ी आज जीविकोपार्जन के लिए दूसरे पेशों में जुटे हैं।
इन खिलाड़ियों की कहानी केवल व्यक्तिगत संघर्ष की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है, जहां राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बाद भी खिलाड़ियों को सम्मानजनक रोजगार और भविष्य की सुरक्षा नहीं मिल पाती। खिलाड़ियों का कहना है कि यदि प्रतिभाओं को समय पर सहयोग और अवसर मिले तो वे देश के लिए पदक जीतकर नाम रोशन कर सकते हैं।
शहर के सिविल लाइंस के रहने वाले फुटबॉल खिलाड़ी अमन कुमार ने बताया कि उनके पिता स्व. गया प्रसाद आरपीएफ में वाराणसी में तैनात थे। परिवार से डांट सुनने के बावजूद उन्होंने खेल नहीं छोड़ा। वर्ष 1991 में नेशनल कैंप तक पहुंचे और करीब सात पदक जीते। वर्ष 1994 तक लगभग दस वर्षों तक फुटबॉल खेला, लेकिन आगे अवसर नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने फोटोग्राफी को अपनाया और वर्तमान में जनरल स्टोर का संचालन कर रहे हैं।
सदर बाजार के रहने वाले राष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी धीरेंद्र कुमार चंद वर्ष 2006 में हरियाणा में आयोजित संतोष ट्रॉफी भी खेल चुके। फुटबॉल में अच्छे प्रदर्शन के बाद भी मुकाम न मिलने के कारण बाद में पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें खेल छोड़ना पड़ा और आज वह सदर बाजार में मोमोज की दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी कंचन सिंह, जिन्होंने वर्ष 1995 में डाभासेमर से अपनी पहचान बनाई। वह वर्तमान में एक निजी विद्यालय में खेल शिक्षिक के रूप में कार्यरत हैं। वर्ष 1995 की राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी नीतू गुप्ता (देवकली) भी निजी नौकरी कर रही हैं। इसी तरह वर्ष 2010 के राष्ट्रीय खो-खो खिलाड़ी अतुल सिंह आज एक निजी विद्यालय में कोच के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय पर बेहतर सुविधाएं, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिले होते तो वे खेल के क्षेत्र में और आगे बढ़ सकते थे।