पूरा देश अब यह जानने के लिए उत्सुक है कि राममंदिर बनने के बाद अयोध्या यानी फैजाबाद संसदीय सीट का चुनावी माहौल कैसा है? राम अब यहां मुद्दा रहे या नहीं? क्या राममंदिर ने अयोध्या, समूचे अवध या पूरे देश में भाजपा का चुनाव आसान कर दिया है? लोगों के जेहन में आ रहे ऐसे दिलचस्प सवालों की लंबी फेहरिस्त है। इनमें से एक का जवाब है कि राम और राममंदिर भले ही अब मुद्दा न रहे हों, लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में लहर तो उन्हीं की है। इस धार्मिक ध्रुवीकरण से भाजपा का चुनाव कितना आसान होगा, इसका जवाब तो भविष्य में ही मिलेगा।
टक्कर देते आंकड़े
रामनगरी के रण के रोमांचक होने का एक पहलू यह भी है कि फैजाबाद के चुनावी नतीजे हमेशा चौंकाते रहे हैं। राममंदिर आंदोलन के बावजूद यहां भाजपा के प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा है। असल में फैजाबाद ने जिस तरह से राजनीतिक दलों को सिर-माथे बैठाया, उसी तरह एक झटके में उतार भी फेंका।
पूरे देश के लिए यही देखना दिलचस्प है कि लल्लू प्रसाद जीत की हैट्रिक लगाते हैं या अवधेश प्रसाद पहली बार यहां खाता खोलते हैं।
तो क्या बसपा बिगाड़ सकती है गणित
इस चुनाव में बसपा की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकते। विपक्षी गठबंधन में शामिल न होकर बसपा क्या राजनीतिक गुल खिलाएगी, कोई नहीं जानता? विभिन्न सीटों पर उतारे गए प्रत्याशी किस दल का गणित बिगाड़ेंगे, यह भी अपने आप में दिलचस्प है।
40 साल से चार नेताओं के इर्द गिर्द राजनीति
अयोध्या की राजनीति बीते 40 साल से चार नेताओं के इर्द गिर्द घूम रही है। ये हैं निर्मल खत्री, मित्रसेन यादव, विनय कटियार और लल्लू सिंह। विनय कटियार तीन बार, मित्रसेन यादव तीन बार, निर्मल खत्री दो बार, लल्लू सिंह दो बार सांसद रह चुके हैं। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि इसमें पांचवें की एंट्री कब और कैसे होती है।
जीते प्रत्याशी वर्ष पार्टी वोट
निर्मल खत्री 1984 कांग्रेस 1,73,152
मित्रसेन यादव 1989 सीपीआई 1,91,027
विनय कटियार 1991 भाजपा 1,69,571
विनय कटियार 1996 भाजपा 2,17,038
मित्रसेन यादव 1998 सपा 2,53,331
विनय कटियार 1999 भाजपा 1,93,191
मित्रसेन यादव 2004 बसपा 2,07,285
निर्मल खत्री 2009 कांग्रेस 2,11,543
लल्लू सिंह 2014 भाजपा 4,91,761
लल्लू सिंह 2019 भाजपा 5,29,021