25- जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व में भक्तिभाव में लीन होकर नृत्य करते जैन श्रद्धालु- संवाद
अयोध्या। आस्था और तप की नगरी अयोध्या में इस समय जैन समाज के दशलक्षण महापर्व की अद्भुत छटा बिखरी हुई है। मंदिरों की घंटियों की मधुर ध्वनि, भजनों की स्वर लहरियां और उपासकों की शांत साधना ने वातावरण को अलौकिक बना दिया है। पर्व के अंतर्गत शुक्रवार को श्रद्धालुओं ने उत्तम आकिंचन धर्म का मर्म आत्मसात किया और वैराग्य की ओर बढ़ने का संकल्प लिया।
जैन धर्म की सर्वाेच्च साध्वी ज्ञानमती ने आंकिचन धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि आकिंचन धर्म का अर्थ है, ममता, लोभ और आसक्ति से मुक्ति। जब साधक हर प्रकार की ‘मालिकाना भावना’ छोड़ देता है, तभी उसका मन शुद्ध होता है। आकिंचन धर्म का सार यही है कि मनुष्य भौतिक वस्तुओं के मोहजाल से निकलकर आत्मा की शुद्धि की ओर बढ़े। यही सच्चा वैराग्य है, और यही जीवन का वास्तविक आभूषण। श्रद्धालुओं ने ध्यानमग्न होकर इस उपदेश को सुना और अपने जीवन में लोभ और मोह का त्याग करने का प्रण लिया।
जैन मंदिर के पीठाधीश रवींद्र कीर्ति स्वामी ने कहा कि बताया कि अकिंचन धर्म का अर्थ केवल वस्त्र, धन या घर छोड़ना नहीं है, बल्कि मन में छिपी आसक्ति को त्यागना है। सच्चा सुख वस्तुओं में नहीं बल्कि त्याग और वैराग्य में निहित है। शुक्रवार को पूरे दिन मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों की गूंज रही। कलशाभिषेक, सामूहिक जाप और शांति पाठ के साथ वातावरण में अद्भुत शांति और करुणा का संचार हुआ। महिलाओं और युवाओं की टोली भक्तिभाव में लीन होकर नृत्य करती रही। महोत्सव में 10 से अधिक प्रांतों से जैन श्रद्धालु अयोध्या पहुंचे हैं। इस दौरान आर्यिका चंदनामती, प्रवक्ता विजय जैन, सुरेंद्र जैन, मनोज जैन, अंशुल जैन, ऋषभ जैन समेत बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु मौजूद रहे।