डॉ. बृजेश कुमार सिंह
अयोध्या। राम मंदिर के ध्वजारोहण समारोह ने देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को एक मंच से कई संदेश दिए। समारोह में सर्वधर्म समाज की मौजूदगी से सामाजिक समरसता और रामराज की स्थापना की छाप छोड़ने की कोशिश की गई। रामराज से मानवता की सेवा करने का संदेश दिया गया। इसके लिए प्रभु श्रीराम का उदाहरण दिया गया कि वह भेद से नहीं बल्कि सेवा से जुड़ते रहे। रामराज से ही विकास और विकसित भारत का मंत्र भी दिया गया।
समारोह की खास बात यह रही कि इसमें कोई विशिष्ट अतिथि नहीं था। सभी समाज के प्रतिनिधि आमंत्रित सदस्य के रूप में बुलाए गए थे। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सभी ने सर्व समाज और सामाजिक समरसता पर जोर दिया। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इन सभी भावों का अपने 33 मिनट के संबोधन में विस्तारपूर्वक प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने राम के प्रति निषादराज की मित्रता और मां शबरी की ममता का जिक्र करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि राम के लिए दोनों ही प्रिय थे। इस वजह से वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने और रामराज की स्थापना हुई। यानी गरीबी, अमीरी, जाति-पाति का वह विभेद नहीं करते थे। यह संदेश देते हुए मोदी ने यह बताने की कोशिश की कि एक समृद्धशाली, शक्तिशाली और विकसित समाज की स्थापना के लिए भेद का भाव मिटाना होगा। यह जताया कि यह मंदिर हमारी आस्था के साथ-साथ, मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी मजबूत करते हैं। इसके लिए उन्होंने अपने शासनकाल का भी जिक्र किया कि पिछले 11 साल में महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, आदिवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा समेत हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है।
मोदी ने त्रेता युग से वर्तमान को भी जोड़ने की कोशिश करते हुए बताया कि त्रेता युग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी थी और 21वीं सदी की अयोध्या मानवता को विकास का नया मॉडल दे रही है। तब अयोध्या मर्यादा का केंद्र थी, अब अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभरने को तैयार है। 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य का सपना साकार करने के लिए गुलामी की मानसिकता से 2035 तक निकलना होगा। इसी के साथ भारत की अगले एक हजार वर्ष की नींव मजबूत होगी।
अवध विश्वविद्यालय के प्रो. अशोक कुमार राय ने बताया कि प्रधानमंत्री के भाषण में सामाजिक समरसता, सद्भाव और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के जिन आदर्शों का उद्घोष हुआ, वे राष्ट्र-जीवन के चिरंतन मूल्यरूप में पुनः प्रकटित प्रतीत होते हैं। उनके वचनों में यह गंभीर संदेश प्रतिध्वनित हुआ कि समाज की अखंड शक्ति लोक-हृदयों के परस्पर-सम्मान और सह-अस्तित्व की आध्यात्मिक चेतना में ही निहित रहती है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि समभाव, करुणा, सहयोग और परस्पर-विश्वास ही सभ्यता की वास्तविक धुरी हैं, जिनके अभाव में प्रगति केवल दैत्यों का मायालोक बन जाती है। भाषण में निहित धर्मात्मक दृष्टि समाज को एकात्मता की ओर और मानवता को सर्वजन-हिताय, सर्वजन-सुखाय के अविनाशी मार्ग पर अग्रसर करती है। यह केवल नीति का निरूपण नहीं, अपितु लोक-कल्याण, राष्ट्र-धर्म और सांस्कृतिक उत्कर्ष का एक प्रेरणामय मंत्र-स्वर बनकर समस्त जनमन में नूतन ऊर्जा का संचार करता है।
नाम लिए बगैर विपक्ष पर हमला
ध्वजारोहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष का नाम लिए बगैर हमला बोला। उन्होंने कहा कि आजादी तो मिली लेकिन मानसिक आजादी नहीं मिल पाई। मानसिकता की गुलामी की जंजीरों में हम जकड़े रहे। हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटाया। गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा। अब सबमें राम और कण-कण में राम हैं। आजादी के 70 सालों में देश विश्व की 11वीं अर्थव्यवस्था बन पाया, जबकि पिछले 11 साल में यह तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सफल हो गया। लोकतंत्र को विदेशों से लेने की बात स्थापित की गई, जबकि हकीकत है कि यह हमारे डीएनए में है।