अयोध्या की रामलीला का रंग-रूप बदल गया है। परंपरा पर तकनीक का कब्जा हो गया है। हाईटेक मंच और विदेशी दलों ने रामकथा की तस्वीर बदल दी है। स्थानीय रामलीलाएं पीछे, अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियों को बड़ा मंच मिला है। आगे पढ़ें पूरी खबर...
रामनगरी अयोध्या की रामलीला अब केवल परंपरा और स्थानीय कलाकारों तक सीमित नहीं है। पिछले करीब एक दशक में इसका रंग-रूप तेजी से बदला है। 2017 में अयोध्या में बंद पड़ी रामलीलाओं को दीपोत्सव के मंच से दोबारा जीवंत करने की पहल हुई। इसके साथ ही रामलीला का केंद्र भी बदला। स्थानीय पारंपरिक मंचन की जगह हाईटेक मंच, सजीव प्रसारण, देश-विदेश की टीमें और फिल्मी सितारे आकर्षण का बड़ा केंद्र बन गए।
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डिजिटल तकनीक और बड़े स्तर के प्रसारण ने रामकथा को अयोध्या की सीमाओं से निकालकर देश-दुनिया तक पहुंचाया। सरकार के संरक्षण में रामलीला और दीपोत्सव को बड़े पैमाने पर लगातार आयोजित किया गया। इससे न सिर्फ दर्शकों की संख्या में इजाफा हुआ बल्कि आयोजन की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी। हालांकि, इस बदलाव के बीच सवाल यह भी उठा कि अयोध्या की अपनी पारंपरिक रामलीला और स्थानीय कलाकारों को अपेक्षित कितनी जगह मिली।
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विदेशी रामलीलाओं से बढ़ा अंतरराष्ट्रीय रंग
दीपोत्सव के मंच पर विदेशी रामलीला दलों की मौजूदगी लगातार बढ़ी। 2019 में मॉरीशस, सूरीनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया और कनाडा की टीमों ने प्रस्तुति दी। 2022 में रूस, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका, इंडोनेशिया, फिजी, त्रिनिदाद एंड टोबैगो और नेपाल के दल पहुंचे।
2023 में नेपाल, म्यांमार, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, रूस और सिंगापुर की टीमों ने मंच संभाला। 2024 में म्यांमार, नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया और इंडोनेशिया के कलाकारों ने रामकथा प्रस्तुत की। जबकि 2025 में श्रीलंका, रूस, थाईलैंड जैसे देशों की मंडली ने रामकथा का मंचन किया।
अयोध्या की रामलीला को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्मी कलाकारों को मंच पर उतारने की शुरुआत 2019 में निर्देशक सुभाष मलिक की पहल से हुई। मनोज तिवारी, रविकिशन, असरानी, पुनीत इस्सर, रजा मुराद, शाहबाज खान, ऋतु शिवपुरी, भाग्यश्री, मालिनी अवस्थी, रिया सिंघा और मणिका विश्वकर्मा जैसे चर्चित नामों ने अलग-अलग भूमिकाओं और प्रस्तुतियों के जरिये रामलीला को ग्लैमर का नया रंग दिया।
पारंपरिक रामलीला की अपनी अलग ताकत
अवध आदर्श रामलीला मंडल के अध्यक्ष महंत मनीष दास ने कहा कि रामकथा की आत्मा केवल हाईटेक मंच और चमक-दमक से नहीं आ सकती। संवाद, अभिनय और पात्रों की भाव-भंगिमा के मामले में पारंपरिक रामलीला की अपनी अलग ताकत है। स्थानीय कलाकारों को रामचरित मानस और शास्त्रीय परंपराओं के प्रसंगों और परंपरा के अनुरूप गहरी समझ होती है। जबकि फिल्मी कलाकारों की रामलीला में पटकथा के अनुरूप संवाद व अभिनय की कमी झलकती है।