अयोध्या। मेडिकल कॉलेज में रीजेंट्स चोरी के खुलासे के बाद ही गुटबाजी बढ़ने लगी थी। दरार इतनी बढ़ी कि कम न हो सकी और दोबारा गुल खिला गई। इसी गुटबाजी के कारण ही यहां प्राचार्य कुर्सी चुनौतियों के नोक पर आ गई है। नवागत प्राचार्य के लिए भी इससे पार पाना आसान नहीं होगा।
मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. पारस खरबंदा को केंद्रीयकृत लैब का प्रभारी बनाया गया था। अप्रैल, 2025 में इसी लैब से रीजेंट्स चोरी का बड़ा मामला सामने आया। लैब के ही दो कर्मचारी रात के अंधेरे में रीजेंट्स के गत्ते ढोते हुए सीसीटीवी में कैद हुए थे। उनमें एक कर्मचारी विभागाध्यक्ष व इंचार्ज से जुड़े एक प्रतिष्ठान में देखा जाता था। कॉलेज की ओर से इसकी जांच कराई गई तो रीजेंट्स के दाखिल-खारिज में काफी अंतर मिला।
इस बीच प्राचार्य ने लैब इंचार्ज को दायित्व से मुक्त करके दूसरे प्रोफेसर की ताजपोशी कर दी। प्रभार छिनने के बाद से तनातनी की चर्चायें होने लगीं। यहीं से गुटबाजी को हवा मिल गई। समय-समय पर कॉलेज में होने वाले कार्यक्रमों, घटनाओं आदि में यह गुटबाजी प्रत्यक्ष रूप से देखी जाने लगी। मीडिया में भी दूसरे गुट के लोग सार्वजनिक तौर से बयान देने लगे। धीरे-धीरे गुटबाजी इतनी प्रगाढ़ हुई कि सामूहिक रूप से शिकायत का रूप लेने लगी।
डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार के कार्यकाल में भी दिखा असर
तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार के कार्यकाल में भी गुटबाजी का असर खूब दिखा। संविदाकर्मी प्रभुनाथ मिश्रा की मौत से लेकर कई घटनाओं के दौरान इसकी चर्चा रही, लेकिन कभी सार्वजनिक स्थलों पर यह प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आया। उनके खिलाफ हुई कार्रवाई के पीछे भी गुटबाजी का अहम रोल बताया गया। इसका नुकसान एमबीबीएस के छात्र-छात्राओं, संकाय सदस्यों से लेकर मरीजों तक को उठाना पड़ा। अब नवागत प्राचार्य के सामने सबसे इसे समाप्त करना व कॉलेज के उत्तरोत्तर विकास को गति देना बड़ी चुनौती है। वह ऐसा कर पाते हैं या नहीं, यह भविष्य की गर्त में है।