अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बुधवार को होने वाली बैठक में ट्रस्ट डीड में संशोधन को लेकर मंथन होगा। माना जा रहा है कि यह संशोधन मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति, उनके अधिकार, कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियां तय करने से संबंधित हो सकता है। ऐसे में ट्रस्ट डीड में संशोधन के मौजूदा प्रावधान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। डीड के अध्ययन से संकेत मिलता है कि ट्रस्ट के संचालन से जुड़े प्रावधानों में संशोधन की गुंजाइश है, लेकिन इसकी एक स्पष्ट सीमा भी तय है।
ट्रस्ट की स्थापना नौ नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन में केंद्र सरकार की ओर से पांच फरवरी 2020 को की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 805(2)(i) में केंद्र सरकार को अयोध्या अधिनियम, 1993 की धारा छह और सात के तहत योजना बनाकर ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था। इस योजना में ट्रस्ट के गठन, प्रबंधन, ट्रस्टियों की शक्तियों और मंदिर निर्माण सहित आवश्यक विषयों को शामिल किया जाना था।
डीड के खंड जे में भी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की संरचना को लेकर स्पष्ट व्यवस्था है। इसमें कहा गया है कि बोर्ड की संख्या और संरचना वही रहेगी, जो ट्रस्ट डीड के खंड डी में निर्धारित है। यानी डीड में संशोधन के नाम पर बोर्ड की मूल संरचना में मनमाना परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
डीड में संशोधन का अधिकार, लेकिन सीमाओं के साथ
ट्रस्ट डीड के खंड क्यू में बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज को ट्रस्ट डीड में संशोधन करने का अधिकार दिया गया है। हालांकि यह अधिकार असीमित नहीं है। डीड के अनुसार ऐसा कोई संशोधन नहीं किया जा सकता, जिससे ट्रस्ट की मूल संरचना, उसके उद्देश्य, केंद्र सरकार की योजना अथवा सुप्रीम कोर्ट के नौ नवंबर 2019 के फैसले के मूल ढांचे में बदलाव हो। यही प्रावधान बुधवार की बैठक में प्रस्तावित संशोधन को महत्वपूर्ण बनाता है। यदि सीईओ की नियुक्ति और उनके अधिकार-कर्तव्यों को स्पष्ट करने के लिए डीड में संशोधन किया जाता है तो वह ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में होगा, बशर्ते इससे ट्रस्ट की मूल संरचना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन न हो।
सीईओ को लेकर क्यों महत्वपूर्ण है संशोधन
बुधवार की बैठक में डीड संशोधन पर होने वाला मंथन इसलिए अहम है क्योंकि ट्रस्ट में सीईओ का पद प्रशासनिक स्तर पर एक नई व्यवस्था के रूप में सामने आ सकता है। यदि संशोधन के जरिये सीईओ की नियुक्ति की प्रक्रिया, बोर्ड के प्रति जवाबदेही, प्रशासनिक अधिकार, वित्तीय एवं कार्यकारी शक्तियां, जिम्मेदारियां और ट्रस्ट के मौजूदा पदाधिकारियों के साथ समन्वय स्पष्ट किया जाता है तो इससे ट्रस्ट के रोजमर्रा के प्रशासन को अधिक संस्थागत स्वरूप मिल सकता है। डीड के मौजूदा प्रावधानों को देखते हुए संशोधन प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर किया जा सकता है, लेकिन ट्रस्ट की मूल संरचना, उद्देश्य और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मूल ढांचे में बदलाव की गुंजाइश नहीं है।