अयोध्या। मधुमेह के मरीजों में पैरों की नसों में होने वाली कमजोरी को शुरुआती स्तर पर पहचानने के लिए अवध विश्वविद्यालय में एआई आधारित डिवाइस विकसित करने पर शोध होगा। इसका उद्देश्य डायबिटिक न्यूरोपैथी की पहचान कर डायबिटिक फुट अल्सर का खतरा बढ़ने से पहले मरीजों की स्थिति का आकलन करना है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की स्वीकृत परियोजनाओं में विश्वविद्यालय की एआई-इनेबल्ड इंटीग्रेटेड डायबिटिक न्यूरोपैथी डिटेक्शन डिवाइस फॉर प्रिवेंशन ऑफ डायबिटिक फुट अल्सर परियोजना शामिल है। भौतिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की डॉ. गीतिका श्रीवास्तव इसकी प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं।
परियोजना के तहत सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और एआई आधारित एनालिसिस को एक साथ जोड़कर डिवाइस विकसित करने की योजना है। डिवाइस के जरिए पैरों की नसों से जुड़े संकेत लिए जाएंगे और उनका कंप्यूटर आधारित विश्लेषण किया जाएगा। इसके आधार पर न्यूरोपैथी से जुड़े जोखिम की पहचान करने वाली तकनीक विकसित की जाएगी। सेंसर से मिलने वाले डाटा के पैटर्न का एआई सिस्टम विश्लेषण करेगा और नसों की कार्यक्षमता का आकलन करेगा।
हालांकि, डिवाइस अभी विकसित और परीक्षण की प्रक्रिया में होगी। मरीजों पर इसकी एक्यूरेसी और क्लिनिकल उपयोगिता का परीक्षण होने के बाद ही इसकी प्रभावशीलता स्पष्ट हो सकेगी। परियोजना सफल होने पर ऐसी तकनीक विकसित करने का रास्ता खुल सकता है, जिससे डायबिटिक न्यूरोपैथी के जोखिम का शुरुआती स्तर पर आकलन किया जा सके।
अल्सर से पहले नसों की कमजोरी पकड़ने की कोशिश
शोधार्थी के अनुसार, डायबिटिक न्यूरोपैथी में लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा रहने से नसों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे पैरों में संवेदना कम हो सकती है और चोट या घाव का पता देर से चलता है। यही स्थिति आगे चलकर डायबिटिक फुट अल्सर का कारण बन सकती है। कई मामलों में मरीजों को पैर में छाले या कट का एहसास नहीं होता और संक्रमण बढ़ जाता है।
शोध में सेंसर से मिलने वाले संकेतों का एआई की मदद से विश्लेषण कर नसों की स्थिति और अल्सर के जोखिम का शुरुआती आकलन करने वाली तकनीक विकसित करने पर काम होगा।