अयोध्या। श्रीराम यंत्र की स्थापना का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि इसने आस्था के साथ सम्मान और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया है। राष्ट्रपति की मौजूदगी में हुए इस आयोजन में विभिन्न जाति, धर्म व राज्य के लोगों की भागीदारी से ''''एक भारत-श्रेष्ठ भारत'''' की भावना भी सशक्त हुई।
राम मंदिर में बृहस्पतिवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रीराम यंत्र की स्थापना की गई। इस आयोजन में देश के कोने-कोने से रामभक्त आमंत्रित किए गए थे। अलग-अलग भाषाएं, वेशभूषाएं और परंपराएं एक ही मंच पर दिखाई दीं, जिससे सांस्कृतिक विविधता में एकता का संदेश और मजबूत हुआ। इसी दौरान उन्होंने मंदिर निर्माण में किसी भी तरह का योगदान देने वालों को भी तरजीह दी।
श्रम और समर्पण के प्रति मजबूत किया आदर का भाव
मंदिर निर्माण में जुटे श्रमिकों, कारीगरों, शिल्पकारों और अभियंताओं व सहयोगियों को सम्मानित करना इस कार्यक्रम का भावुक क्षण रहा। इससे राष्ट्रपति ने संदेश दिया कि राम मंदिर एक धार्मिक स्थल ही नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और हजारों हाथों के श्रम का परिणाम भी है। इस सम्मान के जरिये उन्होंने समाज में श्रम और समर्पण के प्रति आदर का भाव मजबूत किया। अपने भाषण में भी उन्होंने रामराज्य और विविधता में एकता की भावना का कई बार जिक्र किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ा है। उन्होंने आस्था के प्रति सम्मान, परंपराओं के प्रति स्वीकार्यता और सभी वर्गों के योगदान की सराहना की।