अयोध्या। जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में नवजातों के इलाज में जगह की कमी बाधा बन रही है। 18 रेडिएंट वार्मर वाली इकाई में एक बेड पर दो नवजातों को रखकर इलाज करना पड़ रहा है। गंभीर नवजातों के परिजनों को बेड खाली होने तक इंतजार करना पड़ता है।
महिला अस्पताल के तीसरे तल पर नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) संचालित है। यहां समय से पहले जन्मे, कम वजन वाले और सांस लेने में दिक्कत वाले नवजात भर्ती किए जाते हैं। विशेषज्ञ के अनुसार, बीमार नवजातों को 24 घंटे विशेष निगरानी मिलनी चाहिए। गंभीर मामलों में वेंटिलेटर और सुरक्षित रेफरल की व्यवस्था होनी चाहिए।
बस्ती के छावनी क्षेत्र से आई उर्मिला यादव ने बताया कि नवजात को भर्ती कराने के लिए एक घंटे से खड़ी हूं। डॉक्टर ने देखकर इंतजार करने को कहा है। बेड खाली नहीं है। बच्चे की हालत देखकर चिंता हो रही है। पिछले हफ्ते एक मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर चिंता जाहिर की थी।
महिला अस्पताल की सीएमएस विभा कुमारी ने छुट्टी का हवाला देकर सवालों का जवाब देने से इन्कार कर दिया। एसीएमओ डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव ने बताया कि वेंटिलेटर के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा है। बेड बढ़ाने के लिए भी प्रयास जारी है। मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत होने पर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जात है।
हर महीने 250 नवजात होते हैं भर्ती
महिला अस्पताल की एसएनसीयू में हर महीने 200 से 250 नवजात भर्ती होते हैं। 80 फीसदी रोज डिस्चार्ज हो जाते हैं। 20 फीसदी को भर्ती रखना पड़ता है। समय से पहले जन्म, कम वजन और सांस की दिक्कत वाले मामले ज्यादा हैं। दबाव बढ़ने पर एक वार्मर पर दो नवजात रखे जाते हैं। जन्मजात विकृति वाले दो से चार से अधिक गंभीर मामलों को हर महीने दर्शन नगर मेडिकल कॉलेज और वहां से लखनऊ रेफर किया जाता है। दर्शन नगर मेडिकल कॉलेज की एसएनसीयू में 12 बेड हैं।