औरैया। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय में चालान अदायगी के नाम पर हुए गबन मामले में छह माह बीत चुके हैं। दो मौतों के बाद खुलीं इस मामले की कुछ परतें जांच के बाद फाइलों में गुम हो गई हैं। छह माह बीत जाने के बाद भी मामले का खुलासा नहीं हो सका है।
पांच जनवरी को भाऊपुर निवासी शिवाकांत पाठक और उनकी पत्नी सीमा ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। घटना के बाद मिले सुसाइड नोट में एआरटीओ कार्यालय के चालान अदायगी में गबन की बात सामने आई। शिवकांत दिबियापुर रोड स्थित बैंक शाखा में बतौर आउटसोर्सिंग कर्मी के तौर पर काम करता था। यहां एआरटीओ कार्यालय के नकद जमा होने वाले चालान जमा होते थे।
कार्यालय से चालान जमा करने वाले व शिवकांत के बीच तालमेल बना। वहीं गड़बड़ी उजागर होने पर शिवकांत पर कार्यालय के बाबू ललितकांत कटियार व नेता मिश्रा ने गबन की धनराशि जमा कराने के लिए शिवाकांत पर दबाव बनाया। इसके बाद शिवकांत ने आत्महत्या का कदम उठाया। इस पूरे मामले का जिक्र सदर कोतवाली में दर्ज हुए मुकदमे में भी किया गया। जिसके बाद पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज करते हुए ललितकांत को जेल भेजा।
उधर शासन को गबन की सूचना मिली तो कानपुर संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय की टीम ने जांच शुरू की। चालान अदायगी के कागजात जांच टीम ने तलब किए। इस पर एआरटीओ अशोक कुमार ने दिबियापुर थाना में बाबू ललितकांत पर कागजात गुम करने का मुकदमा दर्ज करा दिया। किसी तरह से सालभर के कागजात जांच टीम ने जुटाए। इसी दौरान जांच टीम ने यह भी पाया कि किसी ने गबन की धनराशि जमा भी कर दी।
उधर अधिकारी भी मामले में कुछ बताने से कतरा रहे हैं। फाइलों में पूरा मामला मानो गुम हो गया है। दंपती की मौत के बाद चार बच्चों के सिर से उठा माता पिता का साया शायद जिम्मेदारों अधिकारियों के लिए कोई बड़ा विषय नहीं है। यही वजह है कि मामले को अंतिम मुकाम देने में कुछ खास कवायद देखने को नहीं मिल रही है।
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सूत्रों की माने तो एक व्यक्ति को बचाने का पूरा प्रयास
गबन होता है। राज खुलने पर धनराशि बैंक में जमा कर दी जाती है। यह सब होता है, लेकिन कौन किसने कब यह कर दिया। पता नहीं चलता है। कोई बयान भी नहीं देता है। सूत्रों की माने तो एक व्यक्ति को बचाने के लिए प्रयास हुआ है, जिसका जिक्र सुसाइड नोट में भी हुआ था। पूरा मामला उस व्यक्ति के संज्ञान में था, जिससे मृतक शिवकांत ने गुहार भी लगाई थी।
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मामले को दबाने के लिए चला खूब सिंडीकेट
गबन का राज राज बना रहे इसे लेकर तमाम दांव चले गए। इसे लेकर चुप कराने का भी प्रयास हुआ। सूत्रों की माने तो पैसों का भी खूब बोलबाला रहा। लिखने पढ़ने से लेकर मुंह बंद कराने का भी प्रयास हुआ। बारी-बारी लोगों को चुप कराया गया, लेकिन पीड़ित परिवार को दर्द आज भी जिंदा है। मृतक शिवाकांत के बड़े भाई राजेंद्र पाठक की माने तो मामले में दोषियों को बेनकाब होना चाहिए। छोटे भाई व उसकी पत्नी की मौत के पीछे का सच सबकुछ उजागर होना चाहिए। कौन दोषी है। किसने गबन किया। किसकी वजह से भाई को आत्महत्या का कदम उठाना पड़ा।