फफूंद। कस्बे के सराय बिहारीदास में सालों से फल फूल रहा रजाई का कारोबार पानीपत के कंबलों के आने से दम तोड़ रहा है। हालत यह है कि हर साल सर्दियों के दिनों में दो करोड़ से अधिक का होने वाला कारोबार धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंचने से लगभग 50 से अधिक परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में लोग मजबूरीवश अपना पुस्तैनी काम छोड़कर रजाई-गद्दे के पुस्तैनी कारोबारी पानीपत के कंबल बेच रहे हैं।
फफूंद कस्बे से सटा गांव सराय बिहारीदास रजाई, गद्दा और रजाई निर्माण के लिए कई जनपदों में मशहूर है। यहां जालौन, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, कानपुर देहात, हरदोई, मैनपुरी, एटा आदि जगहों से सर्दी के सीजन में हजारों व्यापारी आकार रजाई, गद्दा, रजाई खोल की खरीदारी करता है। गांव में इस काम को करने वाले बारह से अधिक व्यापारी जुड़े हुए हैं। ये व्यापारी मेरठ, दिल्ली, मुरादनगर से सनील, गाढ़ा, कश्मीरी, थ्रीडी कपड़े का कच्चा माल लाकर उसकी रंगाई, छपाई और सिलाई करवाकर रजाई,खोल और गद्दों को तैयार कराते हैं। जिसमें लगभग पचास से अधिक परिवारों की महिलाएं सितंबर के महीने से ही माल तैयार करने में जुट जाती थीं और जनवरी तक दिन रात काम करके आर्डर के मुताबिक व्यापारियों का माल तैयार करती थीं। इस काम से उन्हें खासी आमदनी होती थी। जिससे वह आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे थे। पिछले दो वर्षों से पानीपत के कंबल ने रजाई उद्योग को चौपट कर दिया। रजाई के मुकाबले कम दाम में मिलने वाले पानीपत के कंबल की अधिक मांग होने से इस कारोबार पर दिन प्रतिदिन ग्रहण लगना शुरू हो गया। आर्डर में आयी कमी और गिरते कारोबार से हो रहे आर्थिक नुकसान को देख रजाई-गद्दे के कारोबार से जुटे व्यापारियों को मजबूरी वश अपने पैतृक कारोबार को कम करके पानीपत के कंबलों के काम को बढ़ाना पड़ रहा है। जिससे सिलाई, रंगाई, छपाई के काम से जुड़े पचास से अधिक परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
फोटो19एयूआरपी 06- मुद्दन खां
रजाई के थोक कारोबारी मुद्दन खां बताते हैं की यह उनका पुस्तैनी काम है। रजाई के काम में अच्छी आमदनी होती थी। जून-जुलाई में माल लाकर बनवाना शुरू कर देते थे, जो जनवरी तक पूरा बिक जाता था, लेकिन अब रजाई की मांग बहुत कम हो रही है। गांव क्षेत्र में भी कंबल की बिक्री ज्यादा बढ़ी है। कंपटीशन इतना हो गया है की एक हजार का बिकने वाला कंबल पर मात्र दस रूपए नफा पर बिक रहा है। जबकि रजाई, खोल और गद्दा में तीस से पचास रुपए प्रति पीस की नफा होती थी। और लागत भी बेहद कम लगती थी।
फोटो19एयूआरपी 07- संदीप बाजपेई
बीस साल से इस कारोबार से जुड़े फफूंद निवासी व्यापारी संदीप बाजपेई ने बताया यहां की बनी रजाई, खोल, गद्दा की बीस जिलों में मांग थी। सर्दियों के लिए अगस्त से माल स्टॉक करने लगते थे। फरवरी तक पूरा स्टॉक बिक जाता था, लेकिन अब कंबल ने रजाई की मांग कम कर दी है। रजाई, गद्दा और खोल में बचत भी अच्छी होने के साथ गांव के लोगों को रोजगार भी मिलता था। अब सब कम हो गया, कंबल में भारी लागत लगाने के बाद भी गोदाम और दुकान का खर्च निकालना भी मुश्किल पड़ रहा है।
फोटो19एयूआरपी 08- प्रमोद कुमार
कपड़े की सिलाई कर रजाई, गद्दा के लिए खोल तैयार करने वाले कारीगर प्रमोद कुमार, नीलम, सोनम, शोभा और इरम आदि ने बताया की दो साल पहले तक सितंबर से काम शुरू करते थे। जो फरवरी तक जारी रहता था। पचास से अधिक परिवार इस काम में लगे हुए थे। प्रति परिवार सौ से डेढ़ सौ रजाई खोल, गद्दा सिलकर छह सौ से आठ सौ रुपए रोज कमाते थे। चार महीने जोरदारी से काम चलता था। जिसकी बचत से आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही थी। दो साल से काम बिलकुल हल्का हो गया है और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।