औरैया। अंग्रेजी हुकूमत को हिला देने वाला वीरता का प्रतीक काकोरी कांड इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस कांड को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर अंजाम दिया था, जिसमें औरैया के वीर मुकुंदीलाल गुप्ता भी शामिल थे। बताते हैं कि अपने बलशाली शरीर के कारण उन्होंने लूटे बक्से का ताला अपने हाथों से तोड़ दिया, तब चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें भारत वीर की उपाधि से नवाजा था। औरैया के शहीद पार्क में स्थापित उनकी प्रतिमा आज भी नौजवानों को उनके अदम्य साहस को महसूस कराती है।
जनवरी 1901 में शहर के एक साधारण वैश्य परिवार में जन्मे भारतवीर मुकुंदीलाल गुप्ता के तेवर शुरू से ही विद्रोही थे। गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत मां का दर्द उन्हें सताता था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गेंदा लाल दीक्षित के संपर्क में आने के बाद देशप्रेम का यह शोला धधकते ज्वालामुखी में तब्दील हो गया और वह देश के प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने वाली मातृ वेदी संस्था में शामिल हो गए।
सबसे पहले उन्होंने षड्यंत्र केस में भाग लिया। इसमें उन पर वर्ष 1918 में मुकदमा चला और छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ कर कार्य करने लगे। इसके बाद उनका संपर्क रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद से हुआ। स्वाधीनता आंदोलन में बार-बार भाग लेने और जेल जाने से इनका परिवार पुलिस के निशाने पर आ गया।
पुलिस आए दिन इनके परिवार को परेशान करने लगी तो परिजन झांसी चले गए। मुकुंदी लाल अपनी गतिविधि में लिप्त रहे। जब काकोरी कांड की योजना बनाई गई तो 9 अगस्त 1925 को अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मुकुंदी लाल ने अंग्रेजी खजाना लूट लिया था। मुखबिर की सूचना पर मुकुंदी लाल 26 सितंबर 1926 को पुलिस के हत्थे चढ़ गए। काकोरी का मुकदमा लखनऊ में चला।
जिसमें मुकुंदीलाल को काला पानी की सजा सुनाई गई। इसके बाद देश आजाद होने के बाद उन्हें रिहा किया गया, लेकिन तब तक भारत माता के इस सपूत का शरीर काफी कमजोर हो चुका था। 12 अक्टूबर 1972 को कानपुर के हैलट अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। इसके बाद शहर के शहीद पार्क में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो आज भी उनकी वीरता की गवाह बनी हुई है।