पूरन चंद का जन्म 15 अगस्त 1913 में जिले संभल के तलवार गांव में हुआ था। तब अमरोहा, संभल मुरादाबाद जिले में ही आते थे। पारिवारिक परिस्थितियों की वजह से पूरन चंद परिवार के साथ करीब 30 वर्ष की आयु में आदमपुर थाना क्षेत्र के साथलपुर गांव में आकर बस गए थे। पूरन चंद के बेटे रामेश्वर सिंह का कहना है कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने मुनिदेव त्यागी के नेतृत्व में अंग्रेजों से खूब लोहा लिया था। एक बार अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने को हुई बैठक में पूरन चंद ने अहम भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों ने उन्हीं पर उनके खिलाफ साजिश रखने का आरोप लगाया था। इसी बात से गुस्साए अंग्रेजी सैनिकों ने उनके सीने पर गोली मार दी थी। खास बात यह है कि जिस वक्त उनके सीने पर गोली मारी गई थी उस समय उनके हाथ में तिरंगा झंडा था, लेकिन गोली लगने के बाद भी उन्होंने तिरंगा नीचे नहीं गिरने दिया था। यह अच्छी बात रही कि गोली लगने के बाद भी वह बच गए थे। सात मई 2007 में हृदय गति रुकने के कारण 94 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। पूरन चंद के जीवन संघर्ष की कहानी आज भी क्षेत्र वासियों के दिलों में जिंदा है।
25 रुपये जुर्मान न देने पर काटी 12 माह की जेल
क्रांतिकारी पूरन चंद को अंग्रेजों ने खूब यातनाएं दी थीं। एक बार ब्रिटिश सेनिकाें ने पूरन चंद के मुंह पर कालिख पोतकर गांव में भी घुमाया था। उसके बाद उन्हें चारपाई से बांध कर बेरहमी से पीटा गया था। अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के चलते पूरन चंद ने 1940 में 25 रुपये जुर्माना न देने की स्थिति में 12 माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई। उन्होंने मुरादाबाद की जेल में सजा काटी।
पौत्र का पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर हुआ चयन
क्रांतिकारी पूरन चंद के वंशजों में उनके बड़े पुत्र रामेश्वर सिंह एवं छोटे पुत्र गंगाराम सिंह हैं। गंगाराम सिंह का पांच वर्ष पूर्व निधन हो गया था। रामेश्वर सिंह के पांच बेटे व एक बेटी है। रामेश्वर सिंह के सबसे छोटे बेटे गोपीचंद का छह माह पूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा के पद पर चयन हुआ है। पूरन चंद के छोटे बेटे गंगाराम के पांच बेटे एवं दो बेटियां हैं। गंगाराम की सभी बेटे गांव में कृषि कार्य करके अपने परिवार का जीवन यापन कर रहे हैं।