अमरोहा। इसे कुदरत की मार कहें या फिर शासन-प्रशासन की अनदेखी। साढ़े छह बीघा जमीन पर निर्भर किसान सुरेंद्र शर्मा का परिवार पिछले डेढ़ साल में बिखर चुका है। दरअसल, सारी जमीन मध्यगंगा नहर के लिए अधिगृहीत क्या हुई, परिवार के सामने रोटी और रोजी का संकट पैदा हो गया। उम्मीद थी कि शासन से उचित मुआवजा भी मिलेगा, लेकिन वह भी पूरी न हुई। इस गम में पिछले डेढ़ साल में एक के बाद एक सुरेंद्र के तीन भाई और मां ने दम तोड़ दिया और रविवार को सुरेंद्र की हार्ट अटैक से मौत हो गई।
गांव कूबी निवासी स्व. रामपाल शर्मा के पास साढ़े छह बीघा जमीन थी। उनके छह बेटे संजीव शर्मा, नीरज शर्मा, संजीव शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, नरेंद्र व सुनील हैं। सभी इस जमीन पर निर्भर थे। यहां पैदा होने वाली फसल से ही उनका परिवार चलता रहा। लेकिन, गांव से निकलने वाली मध्य गंगा नहर में उनकी सारी जमीन आ गई। साल 2011 में नहर के लिए उनकी जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया। उम्मीद थी कि उन्हें सरकार से अच्छा मुआवजा मिलेगा, लेकिन ऐसा हो न सका। ग्रामीणों के साथ उनका परिवार भी चार गुना मुआवजे के लिए आंदोलन में उतर गया।
सुरेंद्र शर्मा के छोटे भाई नरेंद्र शर्मा ने बताया कि लगातार आंदोलन के बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका। ऐसे में परिवार पर रोजी-रोटी का संकट आ गया। जब से आंदोलन शुरू हुआ उसके बाद से उनके भाई भी पूरी तरह टूट चुके थे। जिसके चलते सबसे पहले बड़े भाई, संजीव, उसके बाद नीरज और राजीव की जमीन खोने के सदमे में मौत हो चुकी है। यही नहीं दो महीने पहले भी उनकी वृद्ध मां लक्ष्मी देवी भी इस दुनिया को छोड़ गईं। अब सुरेंद्र शर्मा की मौत से परिवार पूरी तरह टूट चुका है। भाई नरेंद्र ने बताया कि उनके अलावा उनका छोटा भाई सुनील है। धीरे-धीरे परिवार बिखरता जा रहा है। जमीन तो चली ही गई, साथ ही कोई मुआवजा भी उन्हें नहीं मिला है।
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सुरेंद्र शर्मा से परिवार को था सहारा
सुरेंद्र शर्मा परिवार के लिए समर्पित थे। ग्रामीणों के अनुसार सुरेंद्र शर्मा दिव्यांग होने के बाद भी परिवार की जिम्मेदारी उठाते थे। परिवार के लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। शिक्षित होने के चलते वह छोटे बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे। उससे मिलने वाले रुपयों को वह परिवार पर खर्च करते थे। शादी न होने के चलते वह परिवार का पूरा ध्यान रखते थे।
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