गजरौला। औद्योगिक नगरी में होली अलग-अलग तरीके से मनाए जाने के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर पुराने लोग अलग ही अंदाज में होली खेलते थे। टोली घर-घर जाकर होली के गीत गाती थी। होली पर पुरुष कलाकार महिलाओं का वेश धारण कर नृत्य के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि महीनों से होली का इंतजार होता था। मगर आधुनिक समय में होली का स्वरूप ही बदल गया है।
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गजरौला में होली गाने वाली पुरानी टोली में राम रक्षपाल और गैंदा सैनी सबसे अहम थे। टोली घर-घर जाकर होली के गीत गाती थी। जिसे सुनने और देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ता था। इस टोली में बस्ती निवासी रामरक्षपाल घोड़े की खाल पहन कर डांस करते थे, जबकि गैंदा सैनी महिला कलाकार के रूप में लोगों का मनोरंजन करते थे। होली देखने को भीड़ इस कदर उमड़ती थी कि महिलाएं छतों पर चढ़ कर उनकी कलाकारी का आनंद लेती थीं।
-वीरेंद्र बंसल, अध्यक्ष अग्रवाल सभा, महाजन बस्ती गजरौला
आज होली नहीं बल्कि होली का हुड़दंग रह गया है। न तो पहले जैसा भाईचारा है और न ही सौहार्द। नई पीढ़ी डीजे पर डांस करने या शराब और भांग पीने में लग जाती है, जबकि पहले यह इंतजार रहता था कि पुराने गिले शिकवा भुलाकर गले मिलने कौन आया और कौन रह गया। जो नहीं आता था, सब उसके घर जाते थे। बैठ कर पौराणिक किस्से और कहानियों पर आधारित होली गाते थे। होली गाने वाली टीम को कई दिन तक फुर्सत नहीं मिलती थी।
-रामगोपाल शर्मा, सेवानिवृत्त शिक्षक अवंतिका नगर गजराैला
हमें और परिवार को होली का महीनों से इंतजार रहता था। होली के रंग के दिन लोग हमारे यहां होली मिलने आते थे। घर पर जमकर सत्कार किया जाता था। हम भी पूरे दिन लोगों के घर जाकर उनसे मिल कर उनको होली की शुभकामनाएं देते थे। गजरौला जैसी होली हमले कहीं नहीं देखी।
-कमरुद्दीन सेवानिवृत्त शिक्षक जलाल नगर गजरौला
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गजरौला की होली में सभी समुदाय के लोगों का आपसी भाईचारा और सौहार्द साफ झलकता है। लोग मिलकर होली खेलते हैं। होली के रंग के दिन हमारे यहां पर डॉ.जाफर, ईशाक, साबिर अली, कलुवा उर्फ सरताज आदि आ जाते हैं। सब एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की मुबारकबाद देते हैं। इसके बाद गुझिया का आनंद लेते हैं।
-राजकुमार अग्रवाल, स्टेशन रोड गजरौला