अमरोहा। जैसे ढोलक के बिना देसी संगीत अधूरा है। शादी-ब्याह से लेकर तीज-त्योहार तक बिन ढोलक बात नहीं बनती। वैसे ही डमरू के बिना भगवान शिव की आराधना अधूरी नजर आती है। लेकिन सावन के महीने में अमरोहवी डमरू देश के कई राज्यों में अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
जहां शिव की आराधना हो वहां अमरोही भी डमरू जरूर बजता है। यही वजह है कि सावन में कावड़ यात्रा के चलते डमरू की डिमांड बढ़ गई है। कई राज्यों से डमरू की भारी डिमांड आई है।
अमरोहा शहर में ढोलक की 300 से अधिक बड़ी इकाइयां हैं। ढोलक से निकलने वाली लकड़ी (गुल्ले) से कई यंत्र तैयार होते हैं। सबसे आखिर में बचने वाली लकड़ी से डमरू तैयार किया जाता है। लकड़ी हस्तकला एसोसिएशन के अध्यक्ष शक्ति कुमार अग्रवाल ने बताया कि वैसे तो डमरू की डिमांड बारह महीने रहती है, लेकिन सावन माह में डिमांड बढ़ जाती है।
सावन का महीना शुरू होते ही भोपाल, उज्जैन, सिक्किम, कोलकाता, उत्तराखंड के हरिद्वार और ऋषिकेश के अलावा नेपाल काठमांडू से डमरू की डिमांड आई है।
देशभर में केवल अमरोहा में डमरु तैयार होता है। इन दिनों प्रतिदिन दस हजार डमरू निर्यात किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं डिमांड इससे कहीं अधिक आई हुई है। उन्होंने बताया कि दिल्ली, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के कारोबारी अमरोहवी डमरू मंगाते हैं और उसे उन स्थानों पर निर्यात करते हैं जहां-जहां भगवान शंकर की पूजा होती है। उन्होंने बताया कि भगवान शंकर की आराधना डमरू के बिना अधूरी है। इन दिनों हरिद्वार, ऋषिकेश, ब्रजघाट समेत हर एक प्रसिद्ध स्थानों पर अमरोहा का डमरू बजता मिलेगा। तमाम शिवभक्त अपनी कांवड़ में डमरू भी जरूर लाते हैं।