खादर के ग्रामीण इस समय प्रकृति की दोहरी मार से बेहाल हैं। एक तरफ गंगा में आई भीषण बाढ़ ने फसल को लील लिया, तो दूसरी तरफ गंगा तट बांध के किनारे खेतों में आए ओगल (स्वत: जमीन से पानी निकलना) से गन्ने, धान और चारे की फसलें गलने लगी हैं। कई जगह तो फसल पानी के साथ ही बह गई है। जबकि खेतों खड़ी फसल पानी में डूबी है। यदि आने वाले दिनों में यही स्थिति रही तो फसलें तबाह हो जाएंगी।
जिले में करीब 86 किमी के दायरे में गंगा प्रवाहित होती है। धनौरा और हसनपुर तहसील क्षेत्र के गांवों को गंगा के बाढ़ से बचाने के लिए तट बांध बने हैं। बांध के अंदर के खेतों में खड़ी गन्ने, लौकी, तोरई, करेला, लोभिया, हरे चारे की फसलों को बाढ़ ने लील लिया। सब्जी की तो कोई फसल बची ही नहीं है। खेत के खेत नष्ट हो गए। बाढ़ से अकेले गंगा के अंदर खेतों को ही नुकसान नहीं पहुंचा है, बल्कि तट बांध के किनारे उन खेतों में भी फसल गल रही हैं, जो बांध से बाहर हैं। उनमें ओगल का दो से तीन फीट पानी भर गया है।
फसलों को उजाड़ रही बाढ़ : बाढ़ का प्रकोप किसानों की फसलों पर भी पड़ रहा है। हजारों बीघा जमीन में खड़ी गन्ने की फसल तबाह होने की कगार पर है। गांव चकनवाला निवासी जयचंद्र सिंह, श्रीपाल सिंह, राजवीर सिंह, मुरादपुर के मेहर सिंह, जगपाल सिंह, राजवीर सिंह, अलीनगर के छत्रपाल सिंह, मोहरका पट्टी के तस्लीम, आरिफ, कांकाठेर के शीशपाल, नरेश, मोहम्मदाबाद के प्रकाश आदि ग्रामीणों का कहना है कि तट बांध के किनारे खेतों में पानी भर गया है। बाढ़ के दूसरे छोर पर खेतों में स्वत: पानी निकलने की बात 10 साल बाद सामने आई है। इससे फसलों को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। सब्जियों के साथ ही चारे और धान की फसलें सूख रही हैं। ग्रामीणों ने बताया कि स्वत: जमीन से निकलने वाला पानी गर्म होने के साथ फसलों के लिए नुकसान दायक होता है। खेतों में जोंक पैदा हो गई हैं। जिससे ग्रामीणों को चारा काटने या अन्य कार्य करने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।