दशलक्षण महापर्व के नौवें दिन सोमवार सुबह श्रीजैन मंदिर कोट में अभिषेक शांतिधारा एवं पूजन किया गया। पंडित कमल जैन ने कहा कि उत्तम आकिंचन्य को धारण करने का भाव आना एक गुण है। परिग्रह एवं उसके साथ होने वाली चिंता दुख का ही कारण है। जिस प्रकार, एक छोटी-सी फांस भी बहुत दुख का कारण बन जाती है। उसी प्रकार एक लंगोटी मात्र की इच्छा भी बहुत दुखी करती है। बिना मुनि हुए जीव कभी भी पूर्ण समता और सुख को प्राप्त नहीं कर सकता।
धन्य हैं वे मुनिराज जो सर्व परिग्रह का त्याग कर के नग्न मुद्रा धारण करते हैं। चक्रवर्ती व देवादिक भी जिन्हें नमस्कार करते हैं। कहा, तलवार का घाव तो मरहम पट्ठी से अच्छा हो जाता है किंतु वचन का घाव अच्छा नहीं होता। शाम को आरती, बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इस दौरान अध्यक्ष योगेश कुमार जैन, महामंत्री शरद कुमार जैन, कोषाध्यक्ष राजेश जैन, अतुल कुमार जैन, संयम जैन, सोनम जैन, मंजू जैन, अंजलि जैन, सीमा जैन, अर्चना जैन मौजूद रहे।