बारिश कम होने के कारण धान की फसल में बकानिया रोग लग गया है। कम बारिश के कारण ही तना छेदक कीट भी फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने इस समय 15 प्रतिशत नुकसान होने का दावा किया है। जिससे इस बार पैदावार कम होने की संभावना है।
जनपद में करीब 30 हजार हेक्टेयर भूमि पर धान की फसल उगाई गई है। कृषि वैज्ञानिकों और खेती किसानी के जानकारों की मानें तो धान की फसल को पानी की सबसे अधिक जरूरत पड़ती है। इसलिए दोमट और चिकनी मिट्टी में धान की अच्छी पैदावार होती है। सिंचाई के साधन होने पर भूड़ के इलाकों में भी उत्पादन लिया जा रहा है। मगर अच्छी बरसात में धान की फसल खूब वृद्धि करती है। इस बार जुलाई और अगस्त में बारिश कम होने का असर धान की फसल पर पड़ रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ.एके मिश्र, फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ.हादी हसन, डॉ.रोशन कुमार सिंह, प्राची पटेल और डॉ.अमित तोमर, पूर्व कृषि वैज्ञानिक डॉ. बलराज सिंह का कहना है कि उन्होंने पूरे जिले में धान के खेतों का भ्रमण किया। खेतों में घूमने पर पाया गया कि धान की फसल में बकानिया रोग लग गया है। इसके अलावा तना छेदक कीट का प्रकोप भी इस बार अधिक है। इससे फसल उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि किसानों को जिन पौधों में तना छेदक कीट लग गया है, उनको उखाड़ कर खेत से बाहर कर देना चाहिए। इसके अलावा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव कर फसल को नुकसान होने से बचाने की जरूरत है। साथ ही फसल की लगातार सिंचाई करते रहें। जिससे खेत में नमी रहे। ऐसा नहीं करने पर पैदावार घट सकती है।