तहसील क्षेत्र के गांव आजमपुर में चकबंदी प्रक्रिया की वजह से 200 परिवारों के सामने बेघर होने का खतरा मंडराने लगा है। बीते 40 सालों से काबिज भूमि को चकबंदी विभाग ने झील की भूमि में दर्ज कर रखा है। ग्रामीणों को यह भूमि साल 1984 में पट्टे पर दी गई थी।
गांव आजमपुर में चकबंदी को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। कुछ लोग चकबंदी कराना चाहते हैं, तो कुछ इसका विरोध कर रहे हैं। आजमपुर गांव में करीब 1500 बीघा भूमि पर 200 परिवार रहते हैं। 1984 में यह भूमि उनको पट्टे पर दी गई थी। लेकिन, चकबंदी विभाग ने इस भूमि को झील में दर्ज कर दिया। भूमि को झील में दर्ज करने के बाद 200 परिवारों के सामने बेघर होने का खतरा मंडराने लगा है। गांव के पूर्व प्रधान जसवंत सैनी का कहना है कि बीते 40 सालों से जिस भूमि पर वे लोग काबिज है। अब उनके सामने बेघर होने की नौबत आ गई है।
पट्टेदार समरपाल, यशपाल का कहना है कि उन्होंने इस भूमि पर बैंकों से भी ऋण भी ले रखा है और वे सरकार को लगान भी दे रहे हैं। फिर इस भूमि को चकबंदी विभाग ने झील में कैसे दर्ज कर दिया। उनकी मांग है कि चकबंदी विभाग को उनकी भूमि को वापस उनके नाम दर्ज करनी चाहिए। चेतावनी दी है कि उनकी भूमि का विवाद का हल निकाले बगैर आजमपुर में चकबंदी प्रक्रिया नहीं होने दी जाएगी। वहीं, भाकियू शंकर के पदाधिकारी मेजर सिंह ने कहा है कि क्षेत्र के 80 प्रतिशत लोग चकबंदी कराने के पक्ष में नहीं हैं। मई 2024 में बनाई गई रिपोर्ट चकबंदी विभाग के लेखपालों से एक पक्ष से हमसाज होकर तैयार की थी। इस रिपोर्ट का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। ऐसी स्थिति में चकबंदी कराने या नहीं कराने को लेकर सोमवार को होने वाली खुली बैठक महत्वपूर्ण होने जा रही है।
- चकबंदी के लिए सोमवार को आजमपुर गांव में खुली बैठक बुलाई गई है। उसी में ग्रामीणों की रायशुमारी के बाद अग्रिम कार्रवाई की जाएगी। राजस्व रिकार्ड के अनुसार भूमि झील की ही है। - चंद्रकांता, एसडीएम, धनौरा