शाहगढ़ (अमेठी)। हिलोरे मारती आस्था और भक्ति गीतों में झलकती भारतीय संस्कृति। सतरंगी झंडे के साथ श्रद्धालु लगाते नंद बाबा के जयकारे। ढोल-नगाड़े संग उमड़ा आस्था का सैलाब। नंदमहर धाम में सोमवार को कुछ ऐसा ही मनोहारी नजारा परीलक्षित कर रहा था। श्रद्धालुओं ने दर्शन-पूजन करके मेले का आनंद उठाया।
जामो क्षेत्र में पड़ने वाले नंदमहर धाम को लेकर मान्यताएं अलग-अलग हैं लेकिन, एक बात पर सभी राजी हैं। कभी न कभी नंद बाबा कन्हैया और बलदाऊ के साथ यहां आए थे। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर एक बार फिर प्रदेश के कोने-कोने से यदुवंशियों का जमावड़ा नंदमहर धाम पर हुआ।
आलम यह था कि रविवार से शुरू हुआ लोगों के आने का सिलसिला दूसरे दिन सोमवार को भी जारी रहा। हाथों में बड़े-बड़े झंडे लिए यदुवंशियों का काफिला बस बाबा नंद की दर पर पहुंचने को बेताब दिखा। जोर-जोर से जयकारे लगाते बुजुर्ग तो कहीं बच्चों को गोदी में उठाए माताओं की भीड़ उमड़ रही थी। दुकानदारों के शोर और नगाड़ों की थाप माहौल का एक अलग ही अंदाज बयां कर रहे थे।
मुसाफिरखाना से लेकर गौरीगंज बाजार तक मेले के रंगीन नजारे दिखाई दे रहे थे। गौरीगंज में छोटा नंदमहर के पूरे मान सिंह गांव के पास भी मेले का आयोजन किया गया। इसे भी लोग नंदमहर धाम के नाम से जानते हैं। वहां तक न पहुंच पाने वाले लोग यहीं अपनी पूजा करते हैं। दूसरे दिन भी लोगों ने धाम पर पूजन करने के बाद मेले का आनंद उठाया।
यहीं पर किया था हवन-पूजन
पौराणिक मान्यता है कि राक्षस का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण नंदमहर पहुंचे थे। यहां काफी समय बिताने के बाद श्रीकृष्णा ने अपने घर वालों के साथ हवन-पूजन किया था। जिस स्थान पर श्रीकृष्ण, बलराम व बाबा नंद ने हवन-पूजन किया था। वहां पर कार्तिक पूर्णिमा पर मेले का आयोजन किया जाता है।
होती है राजा बलि और पंवरिया की पूजा
पौराणिक आख्यानों में राजा बलि हिरण्यकश्यप के वंशज माने जाते हैं। लेकिन यहां के राजा बलि भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम हैं। जबकि पंवरिया उनके सेवक माने जाते हैं। यदुवंशी राजा बलि और पंवरिया की पूजा करते हैं। नंदमहर मेले का जिक्र गजेटियर में भी है। अवध गजेटियर में लिखा है कि गौरीगंज के उत्तर पूर्व में यादवों का एक बड़ा मेला नंदमहर धाम पर कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है। यहां पर श्रद्धालु राजा बलि और पंवरिया की पूजा करते हैं।