जगदीशपुर : खेत में जलाई जा रही फसल अपशिष्ट (पराली)। -संवाद
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जगदीशपुर (अमेठी)। प्रतिबंध के बावजूद जिलेके कई जगहों पर किसान बेखौफ होकर खेतों में पराली जला रहे हैं। उन्हें न तो प्रशासन की कार्रवाई का डर है और न ही कोर्ट के आदेश की परवाह। ऐसे में पराली जलाने के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है और चारों ओर धुंध फैलने से लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है।
क्षेत्र में धान और गेहूं की खेती प्रमुख रूप से की जाती है। इस समय धान की कटाई का समय चल रहा है। इस बार बारिश की वजह से फसल को काफी नुकसान हुआ है, ऐसे में इस बार कटाई भी देर से शुरू हो सकी है। दोबारा बारिश की आशंका या नुकसान की आशंका को देखते हुए किसानों ने अपनी फसल को मजदूरों के बजाय कंबाइन मशीन से काटना शुरू कर दिया है।
धान की कटाई के बाद बची फसल के अवशेष का निस्तारण करने के बजाय कई किसान इसे खेतों में जला रहे हैं। पराली जलने से जहां इसका धुआं वातावरण के प्रदूषण में बढ़ोत्तरी कर रहा है। वहीं श्वांस के रोगियों को भी दिक्कत हो रही है। प्रशासन के अधिकारी इसे लेकर सख्त नहीं दिखाई दे रहे हैं।
इस समय कुछ किसान धान की कटाई प्रारंभ कर चुके हैं। अधिकांश किसान अपनी फसल को कंबाइन हार्वेस्टर से ही कटवाते हैं। जिस कारण कटाई के बाद खेत में काफी मात्रा में पराली या पुआल बच जाता है। खेत में खड़ी धान की ठूंठ तथा पुआल के कारण गेंहू फसल की बुवाई में काफी कठिनाई आती है। देर से बुवाई के कारण गेहूं का उत्पादन भी प्रभावित होता है। पराली प्रबंधन की सबसे बड़ी समस्या है। इसी से परेशान होकर किसान खेतों में पराली जलाने का विकल्प चुनते हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरके आनंद ने किसानों को किसी भी परिस्थिति में खेतों में आग न लगाने की अपील की है। बताया कि खेत में आग लगाने से जहां पर्यावरण प्रदूषण होता ही है वहीं खेत की मिट्टी भी खराब होती है। आग के कारण खेत में मौजूद लाभकारी केंचुआ, बैक्टीरिया व फफूंद जैसे जीव नष्ट हो जाते हैं।
मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण होती है। मिट्टी में जीवांश की मात्रा में भारी कमी होती है। इस कारण आगे चलकर उत्पादन में कमी होती है। धान की कटाई एसएमएस लगे हुए कंबाइन हार्वेस्टर से ही कराएं तथा कटाई यथासंभव नीचे से ही कराएं जिससे ठूंठ की ऊंचाई कम ही रहे।