जगदीशपुर (अमेठी)। मुहर्रम के अवसर पर मलावा गांव में आयोजित बारह रोजा शहीदे आजम कांफ्रेंस के तीसरे दिन रविवार रात जामा मस्जिद परिसर में विशेष तकरीर हुई। मौलाना मशरूर अशरफी ने कर्बला की ऐतिहासिक घटना का विस्तार से वर्णन करते हुए इमाम हुसैन और उनके साथियों के बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है और इसे गम और शोक के महीने के रूप में मनाया जाता है।
मौलाना ने बताया कि 61 हिजरी (680 ईस्वी) में मुहर्रम की 10 तारीख को कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों का यजीद की सेना से संघर्ष हुआ था। उस युद्ध में इमाम हुसैन सहित अधिकतर साथी शहीद हो गए थे। यह घटना इस्लाम के इतिहास में सत्य, न्याय और बलिदान का प्रतीक बन गई। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और इस्लाम की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। कर्बला की यह कुर्बानी बताती है कि धर्म और इंसानियत की रक्षा के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
तकरीर में मौलाना ने बताया कि मुहर्रम का हर दिन मुसलमानों को यह याद दिलाता है कि सच्चाई के मार्ग पर चलना ही ईमान की असली पहचान है। इमाम हुसैन का जीवन सत्य, साहस और त्याग का संदेश देता है। कार्यक्रम के दौरान मस्जिद परिसर में लोगों ने सादगी के साथ कर्बला के शहीदों को याद किया और उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।