जामों के कमालपुर में कथा सुनते श्रद्धालु। स्रोत-आयोजक
जामों। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता निस्वार्थ संबंधों की अद्वितीय मिसाल है। सच्ची मित्रता समय और परिस्थितियों की कसौटी पर खरी उतरती है, जबकि स्वार्थ से जुड़ी मित्रता अधिक समय तक नहीं टिकती। ये बातें कमालपुर के पूरे राघव पंडित गांव स्थित हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन अवसर पर अयोध्या धाम से आए प्रवाचक आचार्य औचित्यानंद महाराज ने कहीं।
प्रवाचक ने कहा कि सच्चा मित्र वही होता है, जो मित्र के सुख-दुख में सदैव साथ खड़ा रहे। आज के युग में नवयुवकों को श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता से सीख लेने की आवश्यकता है, क्योंकि यह मित्रता पूरे विश्व के लिए आदर्श बन चुकी है। उन्होंने बताया कि ब्राह्मण सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण बचपन में सहपाठी थे।
शिक्षा पूर्ण होने के बाद श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश बने, जबकि सुदामा अभावग्रस्त जीवन जीते रहे। पत्नी के आग्रह पर सुदामा भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण ने बिना कुछ कहे ही अपने बाल सखा को समृद्धि प्रदान कर दी। यह प्रसंग निस्वार्थ प्रेम और करुणा का प्रतीक है।
प्रवाचक ने कहा कि मनुष्य को जीवन में ईश्वर का स्मरण नहीं छोड़ना चाहिए। भजन-कीर्तन और सत्संग से ही जीवन सफल होता है। श्रीमद्भागवत कथा मानव को यही शिक्षा देती है। इस अवसर पर मुख्य यजमान हनुमान महाराज, बबलू, बाबा, सौरभ तिवारी, त्रिपुरारी महाराज, अजीत कुमार आदि मौजूद रहे।