राजेसुल्तानपुर(अंबेडकरनगर)। क्षेत्र के मुमुक्षु आश्रम इन्दौरपुर घिन्हापुर में श्रीमद्भागवत महापुराण अष्टोत्तरशत पारायण महायज्ञ व श्रीमद्भागवत कथा का समापन बृहस्पतिवार को हवन, पूजन व भंडारे के साथ हुआ। बृहस्पतिवार को प्रातः काल से ही आश्रम परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। पीठाधीश्वर सत्यव्रत ब्रह्मचारी ने कहा कि यज्ञ केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और मानवता की एकता का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि में आहुति देकर हम बाह्य अर्पण करते हैं, उसी प्रकार यज्ञ हमारे भीतर के अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध और अज्ञान को भी भस्म करता है। यज्ञ का वास्तविक अर्थ त्याग है।अपने स्वार्थ का त्याग, अपनी इच्छाओं का संयम। जब मनुष्य निस्वार्थ भाव से, बिना किसी लालसा के, लोकमंगल के लिए कार्य करता है, वही असली यज्ञ है। यज्ञ केवल वेदों का अनुष्ठान नहीं है, यह जीवन का दर्शन है। हर शुद्ध कर्म, हर सत्य वचन, हर करुणा भरा कार्य भी यज्ञ है। डॉ. संत शरण त्रिपाठी ने कहा कि भागवत कथा मनुष्य को कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों मार्गों का संतुलन सिखाती है। सेवा, भक्ति और सत्संग से ही जीवन का उद्धार संभव है। इस दौरान बाल मुकुंद दूबे, बसंत गुप्ता, मनीष राय, सुनील यादव, सोभनाथ, सर्वेंद्र वीर विक्रम सिंह, श्याम सुंदर, सुभाष, सुरेंद्र, जगदीश, प्रमोद, सुरेंद्र व अन्य उपस्थित रहे।