विद्युतनगर (अंबेडकरनगर)। सरयू की गोद में बसे टांडा नगर में दुर्गापूजा का इतिहास करीब चार दशक पुराना है। पर्वों को लेकर कई उतार-चढ़ाव देख चुके इस नगर में दुर्गापूजा की धूम रहती है। पूजा पंडालों की संख्या 150 के पार पहुंच चुकी है। प्रत्येक वर्ष श्रद्धालु पूरे उल्लास के साथ नवरात्रि में देवी प्रतिमाओं की स्थापना करते हैं। इसके बाद परंपरा के अनुसार प्रतिमाओं का विसर्जन होता है।
जानकारों के अनुसार टांडा नगर में दुर्गापूजा की शुरुआत वर्ष 1978 से हुई। छज्जापुर दक्षिण निवासी डॉ. सीआर विश्वास ने सबसे पहले थिरुआ पुल के निकट पंडाल सजाकर देवी प्रतिमा स्थापित की थी। वर्ष भर बाद कस्बा मोहल्ले में बल्ली सेठ ने दूसरी तो गयाप्रसाद गुप्त, तामेश्वर बजाज, राधेश्याम व बाबूलाल ने मिलकर तीसरी प्रतिमा स्थापित कराई। इसके बाद से नगर में पूजा पंडालों के बढ़ने का सिलसिला शुरू हो गया।
वर्ष 1988 में छज्जापुर दक्षिण में दुर्गाप्रसाद के आवास के निकट प्रतिमा स्थापना का विवाद काफी सुर्खियों में रहा। विवाद इतना बढ़ गया कि शिकायत तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह तक पहुंच गई। उनके हस्तक्षेप के बाद नगर में यह 13वीं प्रतिमा स्थापित हुई थी। पहली बार वर्ष 1993 में केंद्रीय दुर्गा पूजा महासमिति का गठन हुआ। इसमें मधुवन यादव व घिसियावन को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मौजूदा समय में महासमिति के अध्यक्ष विशाल माझी व महामंत्री दिनेश मौर्य हैं।
महासमिति के अध्यक्ष विशाल माझी का कहना है कि सनातन धर्म की इस परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया जा रहा है। टांडा नगर में हिंदू व मुस्लिम की मिश्रित आबादी है। कुछ मौकों को छोड़ दिया जाए तो यहां सामाजिक सौहार्द्र के बीच तीज-त्योहार मनाए जाते हैं। एक-दूसरे के आयोजन में यहां सभी धर्म के लोग बराबर की भागीदारी करते हैं। इसके चलते ही यहां पर्व का उल्लास और ज्यादा निखरकर सामने आता है।