फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दोषी ठहराने के लिए मृत्यु पूर्व बयान का सत्यापन जरूरी: हाईकोर्ट

विज्ञापन
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या में उम्रकैद की सजा पाए पति समेत पांच को बरी कर दिया। कहा कि दहेज हत्या के मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए मृत्यु पूर्व बयान का सत्यापन जरूरी है। इसके विधिवत सत्यापन के अभाव के सजा नहीं सुनाई जा सकती।
विज्ञापन

यह फैसला न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ.गौतम चौधरी की खंडपीठ ने भदोही के सिंटू आदि की ओर से आदि के खिलाफ दाखिल अपील को स्वीकार करते हुए सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को आजीवन कारावास और प्रत्येक को 50 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी।
मामला ज्ञानपुर थाना क्षेत्र में मियांखानपुर का है। मीरा देवी की शादी पिंटू गौतम के साथ हुई थी। 18 अक्तूबर 2017 को जल कर झुलस गई थीं। मीरा के भाइयों महेंद्र और संतोष ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप लगाया था कि ससुराल में झगड़ा होने पर ससुर, सास और जीजा ने बहन पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। मृत्यु पूर्व बयान में मीरा ने कहा था कि देवर आकाश और सिंटू पुत्र हिंचलाल ने शाम छह बजे आग लगाई थी।
विज्ञापन

दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। एसडीएम के निर्देश पर तहसीलदार सुनील कुमार उसका बयान लेने पहुंचे थे। उनका कहना है कि बयान उनके सामने कानूनगो ने लिखा और उस वक्त परिवार के लोग मौजूद थे। ट्रायल कोर्ट ने मीरा के मृत्यु पूर्व बयान के साथ ही अन्य साक्ष्यों पर भरोसा करते हुए सजा सुनाई थी।
इसके खिलाफ हाइकोर्ट में दाखिल अपील की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मुख्य परीक्षण में उनका कहना था कि मृत्यु पूर्व बयान दर्ज करने से पहले डॉक्टर ने प्रमाणित किया था कि मीरा मानसिक रूप से ठीक थीं। खंडपीठ ने कहा कि याचियों के बारे में मीरा का मृत्युपूर्व बयानभर है। घटना के समय उसका पति दिल्ली में था। कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। तहसीलदार ने स्वयं बयान लिखने की बात स्वीकार नहीं की थी। इसे लिखने वाले कानूनगो से अभियोजन पक्ष की ओर से कभी भी पूछताछ नहीं की गई थी।
पीड़िता ने स्थानीय बोली में बयान दिया था। उसका बयान लेखक ने अनुवाद किया था, इसलिए उसे जिरह के लिए गवाह के रूप में पेश किया जाना आवश्यक था। यदि उसे गवाही के लिए बुलाया गया होता तो बचाव पक्ष को उससे जिरह का अवसर मिलता। ऐसा नहीं करने से बचाव पक्ष को प्रति परीक्षण का अवसर भी नहीं मिला।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें