हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संगठित अपराध की धारा 111 का पूर्ववर्ती प्रभाव भी होगा। ऐसे में बीएनएस के लागू होने से पहले किए गए संगठित अपराध पर भी इसके प्रावधान लागू होंगे। यदि अभियुक्त पर यह साबित होता है कि वह लगातार अपराध में शामिल है और उसके विरुद्ध पूर्व में किसी भी मामले में आरोप पत्र दाखिल हो चुका है तो यह माना जाएगा कि वह लगातार अपराध कर रहा है। ऐसे में वह बीएनएस के तहत संगठित अपराध के दायरे में आएगा। यह आदेश न्यायमूर्ति बीके बिरला और न्यायमूर्ति अरुण सिंह देशवाल की खंडपीठ ने कानपुर के हरेंद्र कुमार मसीह और जितेश झा आदि की याचिकाएं खारिज करते हुए दिया।
कानपुर के कोतवाली थाने में याची पर नजूल भूमि पर कब्जा करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था। पुलिस ने विवेचना के दौरान इसमें संगठित अपराध की धारा 111 को भी जोड़ दिया। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के वकील ने दलील दी कि याची के खिलाफ जिन चार मुकदमों में चार्जशीट दाखिल की गई है, वह बीएनएस लागू होने से पहले के मामले हैं। ऐसे में संगठित अपराध की धारा 111 इसमें लागू नहीं होगी।
वहीं, अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने दलील दी कि याची के विरुद्ध संज्ञेय अपराध में मुकदमा दर्ज है। याची हरेंद्र के खिलाफ 12 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें से चार में आरोप पत्र दाखिल हो चुका है। साथ ही दो का कोर्ट ने सज्ञान लिया है। इसलिए धारा 111 के तहत उसके लगातार अपराध में लिप्त होने की शर्त पूरी होती है। कोर्ट ने कहा की धारा 111 के प्रावधानों से स्पष्ट है कि इसका पूर्ववर्ती प्रभाव भी होगा। याची के विरुद्ध पहले ही चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और दो मामलों में कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है।