हैदराबाद और जेएनयू विवाद ने विचारकों के सामने भारतीय समाज एवं राजनीति को नए रूप में परिभाषित करने की चुनौती खड़ी दी है। पहले राष्ट्रविरोधी नारे और अब मनुस्मृति की प्रतियां जलाए जाने के बाद जिस तरह से राजनीतिक उग्रता सामने आई है, उससे वामपंथी विचारधारा के मायने पर प्रश्नचिह्न लग गया है। अवसरवाद और अहम के टकराव के बीच मान्य विचारों की दशा और दिशा बदल गई है। ताजा परिस्थितियों पर राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री हैरान हैं। वे दो टूक कहते हैं, यह ‘कम्युनिज्म’ नहीं है। वोट की राजनीति में सभी विचार हाशिये पर चले गए हैं। जेएनयू आज असहिष्णुता का सबसे बड़ा अड्डा बना हुआ है। वैचारिक समन्वय के स्थान पर सभी स्तरों पर एक खास तरह की विचारधारा ही हावी है।
जाने माने राजनीतिक विश्लेषक और उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एमपी दुबे कहते हैं, समाजवाद की एक शाखा साम्यवाद है। वामपंथ की विचारधारा के मुताबिक कोई भी संपत्ति व्यक्ति नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र की होती है लेकिन समय के साथ वामपंथ में बदलाव आया है। वामपंथ के गढ़ केरल और पश्चिम बंगाल में भी पूंजीवाद को न्योता जा रहा है। साम्यवाद का एक अर्थ शोषण से मुक्ति भी है। पहले यह मूवमेंट आर्थिक शोषण पर आधारित था लेकिन अब इसमें महिला, दलित, धार्मिक, सामाजिक हर तरह के शोषण शामिल हो गए हैं। इसी के साथ इन वर्गों के हित के लिए संघर्ष भी शुरू है।
प्रोफेसर दुबे का मानना है कि जेएनयू में जो कुछ हो रहा है वह सिद्धांतों की लड़ाई नहीं, वोट की राजनीति है। परिसर में बैठकर शोषण के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए गांवों और पिछड़े इलाकों का रुख करना होगा। जहां तक मनुस्मृति की बात है तो इसके कई बिंदुओं पर आपत्ति हो सकती है लेकिन उसकी प्रतियों को जलाना सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक तथा व्यक्तिगत लाभ का संकेत है। मस्जिद और मंदिर जाने को भी अब राजनीतिक नजरिए से देखा जाने लगा है। जेएनयू असहिष्णुता का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। यहां एक खास विचारधारा को ही प्रत्येक स्तरों पर तरजीह दी जाती है, इससे इतर बोलना गुनाह है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं डीन आर्ट्स प्रोफेसर ए.सत्यनारायण का मानना है कि कम्युनिज्म एक काल्पनिक विचार है। समाजवाद तक पहुंचने की कोशिश होती रही है लेकिन कम्युनिज्म की स्थापना संभव नहीं है। इसकी अवधारणा है कि सबकुछ राष्ट्रीय संपत्ति है जिसका नियंत्रण कुछ लोगों तक ही सीमित रहेगा। वहीं इसका विरोध करने वाला भी कोई नहीं होगा लेकिन भारतीय परिपेक्ष्य में यह व्यावहारिक नहीं है। ताजा विवाद, इसी का नतीजा है। भारत में धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था की जड़ें मजबूत हैं। मौजूदा समय में जो कुछ हो रहा है, वह लोकतांत्रिक नहीं है। आज मनुस्मृति की प्रतियां जलाई गईं, कल संविधान के साथ भी ऐसा हो सकता है। यह लोकतांत्रिक नहीं है। यदि किसी बिंदु पर कोई मतभेद है तो बहस और संशोधन की बात की जा सकती है, लेकिन विरोध का तरीका लोकतंत्र और संविधान से परे नहीं हो सकता है।
वहीं जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष एवं जन संस्कृति मंच के राष्ट्र्ीय महासचिव प्रणय कृष्ण कहते हैं, उपनिवेशवाद से जूझती दुनिया के तमाम मुल्कों की तरह भारत में भी वामपंथ राष्टीय मुक्ति-संग्राम की उपज है, जिसके सबसे यशस्वी प्रतिनिधि भगत सिंह हैं। भगतसिंह के तमाम साथी जेल से छूटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। हमारे शहर में 95 साल के जियाउल हक इसी विरासत की मिसाल हैं। जेएनयू के छात्रों ने कुछ ही साल पहले ब्रिटिश हुकूमत की प्रशंसा के लिए तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को काले झंडे दिखाए और नेस्ले जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को कैम्पस से बाहर किया। किसी एक घटना के बहाने किसी विश्वविद्यालय या राजनीतिक धारा पर हमला गलत है।