इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंडन व यमुना के बाढ़ क्षेत्रों में किसानों को कृषि भूमि बेचने के दौरान अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने के गौतम बुद्ध नगर के डीएम के आदेश को रद्द कर दिया है। कहा है कि प्रत्येक नागरिक को जमीन की खरीद-फरोख्त का कानूनी अधिकार है। केवल उचित व वैध कारण से ही इस पर रोक लगाई जा सकती है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने गौतम बुद्ध नगर के किसान सुरेश चंद व अन्य सहित 11 याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट डीएम को ऐसी शक्ति नहीं देता कि बाढ़ क्षेत्र में बिल्डर को छूट दें और किसान को भूमि बेचने के लिए अनापत्ति लेने को कहें। डीएम को कृषि जमीन बेचने पर रोक लगाने या शर्त थोपने का अधिकार नहीं है।
विकास प्राधिकरण ने निर्णय लिया था कि नोएडा व ग्रेटर नोएडा में हिंडन व यमुना बाढ़ क्षेत्र में जमीन की खरीद-फरोख्त के लिए अनापत्ति लेनी होगी। याचियों ने बिना अनुमति लिए कृषि भूमि बेची। इस पर प्रशासन की ओर से कार्रवाई की गई, जिसे हाईकोर्ट में किसानों ने चुनौती दी। किसानों ने कहा हम जमीन के स्वामी और कब्जेदार हैं। जरूरत के लिए अपनी मर्जी से जमीन बेचने का अधिकार है।
कोर्ट ने तमाम फैसलों व कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए डीएम के अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की अनिवार्यता रद्द कर दी। साथ ही कहा है कि बाढ़ क्षेत्र में कोई भी अवैध निर्माण बिना अधिकारियों की मिलीभगत से नहीं हो सकता। उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिन्होंने बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण की अनुमति दी।
कोर्ट ने कहा यह देखकर आश्चर्य होता है कि जो प्राधिकरण बाढ़ क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों के पनपने के लिए जिम्मेदार हैं, अब किसानों को उन्हीं से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने के लिए कहा जा रहा है। यह पूरी तरह से सिस्टम का मजाक उड़ाना है। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे लोमड़ी को मुर्गीघर की रक्षा करने के लिए कहा जाए। कोर्ट ने 30 सितंबर 2020 के आदेश व आठ जुलाई 2024 के शासनादेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।