इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी का नाम प्राथमिकी में नहीं था। उसकी गिरफ्तारी के दो माह बाद देरी का उचित स्पष्टीकरण दिए बिना पहचान परेड कराई गई। ऐसे में केवल पहचान परेड के आधार पर हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय व न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर हत्या में आजीवन कारावास की सजा काट रहे भोला को बरी कर दिया।
वर्ष 1981 में भदोही के ज्ञानपुर निवासी लालमणि दुबे ने आरोप लगाया था कि दुश्मनी की वजह से ब्रह्माशंकर ने विजय शंकर व तीन अन्य के साथ मिलकर उनके घर पर हमला कर दिया था। घटना में गोली लगने से भतीजे राकेश कुमार की मौत हो गई थी। मामले में दो नामजद आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई तो संदेह के आधार पर भोला को गिरफ्तार कर पहचान परेड में शामिल किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने 10 जुलाई 1989 को हत्या में आरोपी ब्रह्माशंकर, विजय शंकर, निरहू और अवध नारायण को बरी कर दिया था। वहीं, भोला को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई तो उसने फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष भोला के विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान आपस में विरोधाभासी पाए गए। साथ ही पहचान परेड में दो महीने की देरी का कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि भोला का अपराध से कोई संबंध या मकसद था। सुप्रीम कोर्ट के हरिनाथ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1988) के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि पहचान परेड में अनावश्यक देरी और गवाहों का आरोपी से पहले से परिचित होना अभियोजन के दावों को अविश्वसनीय बनाती है।