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न्याय के दुश्मनों का चाबुक मोटा करती है वकीलों की हड़ताल: हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकीलों की आए दिन हो रही हड़ताल पर सख्त नाराजगी जताते हुए कठोर टिप्पणी की है। कहा, कोर्ट कोई औद्योगिक प्रतिष्ठान नहीं है, जो हड़ताल करें। न्यायिक प्रणाली में हड़ताल से न्याय का पहिया रुक जाता है। इससे न्याय के दुश्मन खुश होते हैं। उनके चाबुक और मोटे हो जाते हैं। लाठियां दिन-ब-दिन खून बहते घावों को और गहरा करती जाती हैं।
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बलिया जिले की रसड़ा तहसील में बार-बार होने वाली हड़ताल पर जंग बहादुर कुशवाहा की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने की। कोर्ट ने यूपी बार कौंसिल से जवाब तलब करते हुए अगली सुनवाई पांच फरवरी नियत की है।
कोर्ट ने कहा कि अदालतें औद्योगिक प्रतिष्ठानों की तरह नहीं हैं, जहां हड़तालें हो सकती हैं। औद्योगिक प्रतिष्ठानों में ट्रेड यूनियन नियोक्ताओं से अपनी मांगों को पूरा करने के लिए औद्योगिक मजदूरों की हड़ताल को उचित ठहरा सकते हैं, लेकिन अदालती कामकाज में ऐसी हड़तालों को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
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यूपी बार कौंसिल और बार एसोसिएशन को अपनी मांगों के लिए सौदेबाजी करने वाले ट्रेड यूनियन के समान नहीं माना जा सकता है। वे किसी भी समस्या का समाधान खोजने के लिए सभी कानूनी साधनों से सुसज्जित हैं। वकीलों की हड़ताल से न केवल न्यायिक समय बर्बाद होता है, बल्कि सामाजिक मूल्यों का पतन भी होता है।
कोर्ट ने कहा, वकीलों के पास न्यायिक कार्य का बहिष्कार किए बगैर ही वैध शिकायतों को दूर कराने के लिए पहले से बना तंत्र है। इसमेें जिला जज, सीजीएम, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आदि शामिल हैं। अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी गतिविधियों में शामिल होने के बजाय न्यायिक प्रणाली की गरिमा को बनाए रखें।
खुद के लिए बनाएं दिशानिर्देश
कोर्ट ने बार काैंसिल को निर्देश दिया कि वह शोक संवेदनाओं और अन्य स्थितियों के पालन के संबंध में खुद के तैयार दिशानिर्देशों को प्रस्तुत करे। ताकि, यह साफ हो सके कि यूपी के जिलों या तहसीलों के वकील अपने काम से कब विरत रह सकते हैं।
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