इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जहां प्रत्यक्ष और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हैं, वहां मकसद पीछे रह जाता है, लेकिन, जहां चश्मदीद गवाही संदिग्ध है, वहां मकसद का होना मायने रखता है। यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति मोहम्मद अजहर हुसैन इदरीसी की खंडपीठ ने बुलंदशहर के हत्या के दोषी को बरी कर दिया।
बुलंदशहर के खुर्जा में 15 जुलाई 2006 को सुनील पर एक महिला की हत्या करने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था। शिकायतकर्ता विनोद ने आरोप लगाया था कि सुनील ने उसकी पत्नी कुंती की ईंट से प्रहार कर हत्या दी। बताया कि आरोपी के बुआ का घर उसके घर के सामने ही है। वह अपने बुआ के घर आया था। उसकी बुआ की बेटी से पानी को लेकर कुछ विवाद कुंती से हुआ था। इसी को लेकर उसने घटना को अंजाम दिया। मामले में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बुलंदशहर ने हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई तो सुनील हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान में विरोधाभास और विसंगतियां हैं। घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। इसलिए यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य का मामला है। इसलिए सबूतों की एक पूरी शृंखला होनी चाहिए, जो यह इशारा करे कि अपीलकर्ता ने ही मृतक को ईंट से चोटें पहुंचाईं। स्वतंत्र गवाहों से पूछताछ न करना भी अभियोजन पक्ष के लिए घातक है। ऐसे किसी भी गवाह के अभाव में अभियोजन की पूरी कहानी खारिज हो जाती है।