इलाहाबाद हाईकोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मभूमि व शाही ईदगाह विवाद मामले की सुनवाई मंगलवार को भी वाद की पोषणीयता को लेकर हुई। इस दौरान हिंदू पक्ष की ओर से ईदगाह पर बने हिंदू प्रतीकों के छायाचित्र कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए। कहा गया कि शाही ईदगाह वक्फ संपत्ति नहीं है। वर्शिप एक्ट, वक्फ एक्ट और आदेश-सात नियम 11 इस वाद में लागू नहीं होता। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की कोर्ट कर रही है।
शूट नंबर नौ की तरफ से अधिवक्ता सौरभ तिवारी ने पक्ष रखते हुए कहा कि शाही ईदगाह वक्फ संपत्ति नहीं है। गलत तरीके से इसे वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है। वक्फ एक्ट के तहत वक्फ संपत्ति घोषित करने के दौरान प्रभावित को नोटिस दिया जाना जरूरी है। इसका अनुपालन न होने पर यदि प्रभावित सिविल कोर्ट जाता है तो कोर्ट को ट्रायल का अधिकार है। उन्होंने कहा कि इस मामले में लिमिटेशन एक्ट भी लागू नहीं होगा। 1968 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संघ और शाही ईदगाह कमेटी के बीच किए गए समझौते को अवैध बताया। इस समझौते के तहत दो एकड़ भूमि शाही ईदगाह को दी गई थी।
इसी तरह शूट नंबर 13 के वादी अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने पक्ष रखते हुए कहा कि शाही ईदगाह पक्ष के लोग श्रीकृष्ण जन्म स्थान पर किस आधार पर कब्जा किए हैं। इसका कोई भी दस्तावेज उनके पास नहीं है। इस दौरान सर यदुनाथ सरकार की किताब मासिरे आलमगिरी, एंपरर औरंगजेब एंड डिस्ट्रक्शन आफ टेंपल व मथुरा डिस्टि्रक्ट मेमोर प्रस्तुत की और मंदिर व गुरुकुलों को तोड़े जाने की बात कही। साथ ही न्यायालय से वक्फ एक्ट की समीक्षा किए जाने का अनुरोध किया। वहीं अधिवक्ता रीना एन सिंह ने शूट नंबर सात की तरफ से पक्ष रखा। शूट नौ,11 और 18 में बहस हुई। श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के अधिवक्ता हरेराम त्रिपाठी, अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह व वीडियों कांन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तसनीम अहमदी और हरिशंकर जैन मौजूद रहे।
शाही ईदगाह के पक्षकार अवैध कब्जाधारी: हिंदू पक्ष के वकील
हिंदू पक्ष के वकील महेंद्र प्रताप का कहना था कि यह विवाद पोषणीय है और शाही ईदगाह पक्ष के लोग अवरोध पैदा कर रहे हैं। शाही ईदगाह के पक्षकारों से पूछा जाए कि किस आधार पर वह कब्जा कर बैठे हुए हैं। शाही ईदगाह के पक्षकार ना तो मालिक हैं ना ही किरायेदार। वह सिर्फ अवैध कब्जाधारी हैं।