इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत से कथित तौर पर लापता हुए शिव कुमार के मामले में दाखिल किए गए अनुपालन हलफनामे पर डीजीपी के रुख की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि उनके हलफनामा यह दिखाता है कि उनके आदमी सही और याचिकाकर्ता गलत हैं। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को आपराधिक याचिका में बदल दिया। साथ ही इस मामले की सुनवाई के लिए 12 दिसंबर, 2025 की तिथि नियत की है।
याचिका में आरोप है कि बस्ती निवासी शिवकुमार को 2018 में थाना पैकोलिया पुलिस हिरासत में लिया था और वह तब से लापता है। उसके पिता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है। इस मामले में कोर्ट ने डीजीपी को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था। आदेश के अनुपालन में डीजीपी ने हलफनामा दायर किया।
कोर्ट ने डीजीपी के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि पूर्व आदेशों को ध्यान में दिए बिना यह हलफनामा दायर किया गया है। डीजीपी के रुख का हम सराहना नहीं करते हैं। हमारे आदेशों के बीच एक व्यक्ति है, जो पुलिस स्टेशन गया और प्रथम दृष्टया पुलिस हिरासत से लापता हो गया। वह अभी भी लापता है।
डीजीपी के हलफनामे में शिव कुमार का पता लगाने के लिए किए गए प्रयासों का विवरण दिया गया है। कहा गया है कि 2018-2019 की अवधि के कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स का समय बीत जाने के कारण नहीं मिला। सीसीटीएनएस पोर्टल पर भी कोई जानकारी नहीं है। क्राइम रजिस्टरों में 10 सितंबर 2018 से 20 सितंबर 2018 तक जांच की गई उसमें शिव कुमार को थाने लाने को लेकर कोई जानकारी नहीं है। गांव के चौकीदार और होमगार्ड ने सितंबर 2018 में शिव कुमार को पैकोलिया पुलिस थाने पर कभी नहीं देखने की बात कही।
न्यायालय ने इन सब प्रयासों को अपर्याप्त माना। कोर्ट ने कहा पुलिस हिरासत से लापता हुए युवक का पता लगाने का पुलिस रजिस्टर कोई रिकॉर्ड नहीं हैं। प्रथम दृष्टया पुलिस हिरासत से लापता मामले में विवेकपूर्ण तरीके से जांच की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अब उप-निरीक्षक और दो अज्ञात कांस्टेबलों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की गहन जांच की जानी चाहिए। लापता युवक का पता लगाने के लिए व्यापक प्रयास की आवश्यकता है।